क्या बिहार में एमआइएम भी है निशाने पर ?

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सीमांचल में उबाल खा रहा है यह सवाल, क्योंकि एमआइएम के ही निशाने पर है जदयू सहित महागठबंधन । अल्पसंख्यक राजनीति में शहाबुद्दीन प्रकरण से एमआइएम को मिल रही मजबूती

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फोटो – एमआइएम के रण बांकुरे

सीमांचल ( अशोक कुमार )।

सीमांचल के पूर्णिया , किशनगंज और अररिया की राजनीति को पूरी दबंगता के साथ झंकझोरने में लगी हैदराबादी पार्टी एमआइएम की लगातार बढ़ती जा रही सक्रियता से फिलबक्त सुप्तावस्था में पड़ी शेष पार्टियों में अपने भावी अस्तित्व को बचाने को लेकर चिंता व्याप्त होने लगे हैं।

एमआइएम ने अपने झंडे बैनरों का इस्तेमाल उपरोक्त चर्चित क्षेत्रों के सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में ही फिलबक्त करना शुरू किया है और कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि मुस्लिम बहुल इलाकों की जनता के बीच एमआइएम ने विभिन्न मुद्दों को गम्भीरता पूर्वक परोस कर जनता को अपने पक्ष में इस तरह से मंत्रमुग्ध कर दिया है कि फिलबक्त तक किशनगंज सम्पूर्ण जिले में जनता को एमआइएम के अलावा कोई अन्य राजनीतिक पार्टियों की कोई गतिविधियां तक नजर नहीं आ रही है तो पूर्णिया के दो विधानसभा क्षेत्रों वाले बायसी अनुमण्डल में भी वैसी ही स्थिति स्थापित हो गई है।

अररिया के सिर्फ जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र में ही फिलबक्त एमआइएम पूरी तरह से जनता में पैठ बनायी हुई है लेकिन एमआइएम का दावा है कि वह अगले संसदीय चुनाव में अररिया संसदीय क्षेत्र की सीट को भी किशनगंज संसदीय क्षेत्र की सीट के साथ ही जीतकर दिखाएगी।

सीमांचल में किशनगंज और पूर्णिया जिलों में एक लंबे अरसे से राजद और कांग्रेस के ही बर्चस्व स्थापित रहे थे लेकिन बीच के समय में राजद और कांग्रेस के बीच सेंधमारी की राजनीति करके नीतीश कुमार की जदयू ने भी एक बड़े हिस्से पर अपना बर्चस्व कायम किया था।

कालांतर में एमआइएम ने अपनी मजबूत संगठन क्षमता को आर एस एस की तर्ज पर जोरदार तरीके से बढ़ाया तो एमआइएम की किस्मत से सीएए – एनआरसी के मुद्दों का बाजार गर्म हो गया और एमआइएम की दाल स्वतः स्फूर्त इस सीमांचल में गल गई और एक साथ विभिन्न क्षेत्रों की सीटों से एमआइएम के पांच विधायक जीत हासिल कर स्थापित हो गए।

फिर नयी रणनीति के तहत पांचों विधायकगण एक साथ ही हर जिले के हरेक क्षेत्र में आने जाने लगे। जनता की जरूरतों को पूरी दबंगता के साथ पांचों विधायक एक स्वर से सरकारी तंत्रों के समक्ष प्रस्तुत करने लगे।

सरकार उन जरूरतों की पूर्ति करे या नहीं करे , जनता की नजर में तो अब एमआइएम की ही साख जम गई , खासकर अल्पसंख्यक समुदाय में। लिहाजा , फिलबक्त , एमआइएम से मुंह लगाने की हिम्मत किसी दल में नजर नहीं आ रही है।

और , इसी बीच कोरोना काल की गहमागहमी के बीच सिवान के पूर्व सांसद सैयद शहाबुद्दीन की मौंत पर महागठबंधन की ओर से साधी गई चुप्पी भी एमआइएम के लिए वरदान साबित हो गई। अल्पसंख्यक बहुल सीमांचल में अब एमआइएम के हाथ अल्पसंख्यक राजनीति के लिए बड़ा मुद्दा इसी रूप में आ गया।

एमआइएम के सीमांचल स्थित पांचों विधायकों अख्तरूल ईमान , अंजार नईमी , शाहनवाज आलम , इजहार असफी , और सैयद रूकनुद्दीन का मानना है कि उनके हाथ से सीमांचल को बेहाथ करने की कोई ताकत अब बिहार के किसी राजनीतिक दल में बची ही नहीं है।

एमआइएम के एक नेता हाजी महबूब का कहना है कि शहाबुद्दीन की उपेक्षा के मामले में महागठबंधन के साथ साथ जदयू के चेहरे से भी झूठे मुस्लिम तुष्टीकरण के नकाब उतर गए हैं। और , एमआइएम इस सीमांचल में अब गरीब गुरबों , कमजोरों की आवाज़ बनती जा रही है।

सीमांचल की राजनीति में तेजी से मजबूती के साथ उभरती एमआइएम को लेकर अब जनता के बीच तरह तरह की चर्चाएं शुरू हो गई है।

चर्चानुसार ,   नीतीश कुमार की भाजपा-जदयू गठबंधन वाली एनडीए की सरकार के कार्यकाल में  जीतनराम मांझी की पार्टी हम के बाद चिराग पासवान की लोजपा की भी आखिर छीछालेदर हो ही गई   और उसके बीच की अवधि में रालोसपा व भीआईपी भी अपनी छीछालेदर से अछूता नहीं रह पाया  और अब नयी  चर्चा  के अनुसार बिहार की कांग्रेस में भी टूट की आशंका व्यक्त की जाने लगी हैं ।

तो , ऐसे में अब एक सवाल एमआइएम को लेकर उठाया  जा रहा है कि पांच विधायकों से सीमांचल के क्षेत्रों में लैश एमआइएम में तोड़फोड़ करने की ताकत बिहार की सत्तारूढ़ दलों में है कि नहीं ।

हाल के पिछले दिनों में एक सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से आशंका व्यक्त किये गए थे कि जदयू के द्वारा एमआइएम के विधायकों के बीच तोड़फोड़ की कोशिशें शुरू की गई हैं, लेकिन , उक्त खबर का एमआइएम की ओर से तत्क्षण खंडन कर दिया गया था।

लेकिन , बिहार में जारी तोड़फोड़ की वर्तमान राजनीति का जमकर मजा ले रहे लोगों के बीच यह सवाल लगातार उबाल खा रहा है कि जिस चाणक्य नीति के तहत कुछ छोटे छोटे दलों के अस्तित्व को कमजोर करने का काम किया गया ,उस चाणक्य नीति के तहत ही बिहार की सत्तारूढ़ दल में एमआइएम पर हाथ डालने की हिम्मत क्यों जबाब दे रही है।

जबकि सीमांचल में पूरे तामझाम के साथ स्थापित एमआइएम के पांचों विधायकगण पांच पांडव वाली ताकतों के साथ जहां जहां स्थापित हुए हैं , वहां वहां से न सिर्फ कांग्रेस और राजद की जड़ों को नेस्तनाबूद करने में लगे हैं , बल्कि , पूरी ताकत के साथ बिहार की सत्तारूढ़ दल जदयू और भाजपा का भी सूपड़ा साफ करने में जी जान से लग गए हैं।

दावे के साथ कहा जा रहा है कि   एमआइएम ने अपने एरिया में पब्लिक को इस तरह अपने पक्ष में मंत्रमुग्ध कर दिया है कि उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों की कोई जनता अब एमआइएम के सिवा किसी दूसरी पार्टी का नाम तक सुनना नहीं चाहती है।…….

और , वैसी स्थिति में अगर कोई अनहोनी की राजनीतिक साजिश इस सीमांचल में करने की कोशिशें हुई तो निःसन्देह उन तमाम पार्टियों की अल्पसंख्यक समुदाय के द्वारा छीछालेदर कर दी जा सकती है जो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति के बूते सीमांचल में अपने अरमानों को कामयाब करने की ताक में हैं।

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