पूर्णिया से किशनगंज तक की दलित उत्पीड़न वाली घटनाओं का हुआ पटाक्षेप

0
cyz

त्वरित पुलिस अनुसंधान की पारदर्शिता से किशनगंज और पूर्णिया में सदभाव बिगाड़ने की कोशिश करने वाले तत्वों की नहीं गली दाल

पूर्णिया-एसपी-कुमार-आशीष
फोटो – किशनगंज एसपी कुमार आशीष एवं पूर्णिया एसपी दयाशंकर

सीमांचल ( अशोक कुमार )।

भले ही बिहार में एक बार फिर से बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन दल भाजपा और जदयू के बीच तनावपूर्ण स्थिति कायम होने की खबरें जोर शोर से फैल रही है तो दूसरी ओर एक बात यह भी सामने आ गई है कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी सदभावपूर्ण कार्यशैली के बीच अपने साथ शामिल गठबंधन दल की किसी भी तरह की किसी दखलंदाजी को सहन करने वाले नहीं हैं।

इस बात का सहज अंदाजा इस बार सीमांचल की कुछ हालिया दलित उत्पीड़न वाली घटनाओं के बाद उस समय लगाया गया , जब , सीमांचल के पूर्णिया और किशनगंज में पिछले महीने घटी दलित उत्पीड़न की घटनाओं का राजनीतिक रूप से विरोध  करते हुए सत्तारूढ़ दल के ही एक सहयोगी दल के कुछ उदण्ड तत्वों ने जी जान से उन घटनाओं की आड़ में सदभाव को बिगाड़कर राजनीतिक रोटी सेंकने का प्रयास जमकर

किया तो वर्तमान सरकार के मुखिया के इशारे पर इन क्षेत्रों में तैनात एसपी व प्रशासन ने ऐसे तत्वों के नापाक इरादों को तत्क्षण अपनी अनुसंधान की रिपोर्ट के बल पर ऐसा इंसाफ दिखाया कि सारे मामले दूध का दूध और पानी का पानी की तरह साफ साफ जनता की नजरों में आ गया और सदभाव बिगाड़ने की कोशिश करने वाले तत्वों को मैदान से भागना पड़ा।

लोगबाग चर्चा कर रहे हैं कि बिहार की सरकार के नेतृत्वकर्ता और जदयू के सिरमौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  अब  इस सीमांचल के क्षेत्रों में बीजेपी की भी राजनीतिक दाल को गलने देने के पक्ष में नहीं हैं और फिलबक्त जहां कहीं भी भाजपाइयों के द्वारा कोई बबाल मचाने की कोशिशें की जा रही है , वहां के सरकारी तंत्रों प्रशासन व पुलिस के द्वारा ऐसी त्वरित गति से कांडों का निष्पादन किया जा रहा है कि हरहोड़ मचाने की कोशिश करने वाली भाजपा को औंधे मुंह जमीन पर गिरने की नौबत आ खड़ी होती है और मामला ठंढ़े बस्ते में डालने की नौबत उठानी पड़ती है।

बीते मई महीने में अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाले बिहार के सीमांचल पूर्णिया प्रमंडल के विभिन्न स्थानों पर महादलित समुदाय के बीच घटित कुछ घटनाओं को लेकर बीजेपी और उसके सहयोगी हिंदूवादी संगठनों ने जो विरोध के राजनीतिक सुर अलापे थे , वह विभिन्न राजनीतिक व सरकारी परिस्थितियों के कारण पानी के बुलबुले की तरह उगे और फिर समाप्त हो गए।

19 मई को पूर्णिया जिले के बायसी क्षेत्र के मझुआ गांव में वर्षों से चली आयी पुरानी खुन्नस में कुछ सिरफिरे पड़ोसियों के द्वारा महादलितों के 13 घरों में आगजनी की हुई घटना को लेकर राजनीतिक हित साधने के लिए बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों ने जमकर हल्ला हसरात मचाये थे।जबकि पीड़ित महादलितों की ओर से दर्ज कराये गए मामले के नामजदों की गिरफ्तारी में पूर्णिया पुलिस पीछे नहीं थी।

उसके बाद ही किशनगंज के बहादुरगंज थानांतर्गत हरिजनों की एक बस्ती देशिया टोला में लालचंद हरिजन नामक एक व्यक्ति की हत्या की घटना जब प्रकाश में आयी तो वहां भी अल्पसंख्यक समुदाय पर ही निशाना साधते हुए बीजेपी और उसके सहयोगी हिंदूवादी संगठनों ने तिल का ताड़ करना शुरू कर दिया और किशनगंज जिले की राजनीति को सरगर्म करना शुरू किया तो किशनगंज की पुलिस ने तमाम राजनीतिक गतिविधियों के बीच ही अपने निष्पक्ष अनुसंधान से सावित कर दिया कि उक्त घटना को मृतक की पत्नी की साजिश के तहत मृतक की पत्नी के प्रेमी ने ही अंजाम दिया था।

लिहाजा ,  पुलिस के अनुसंधान से कांड की खुली पोल के कारण बीजेपी और उसके सहयोगियों के हाथों से वह मामले भी फिसल गए और उन्हें हाथ मलकर चुप्पी साधने को मजबूर होना पड़ा।

इसी के बीच मई माह बीतते बीतते गत 30 मई को बीजेपी के पूर्णिया विधायक के हाथों एक महादलित की पिटाई की खबरें जो फैल गयी तो बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों के पैरों के नीचे से जमीन खिसकने की नौबत आ गई और स्वयं बीजेपी के विधायक ही महादलित उत्पीड़न की घटना में आरोपित हो गए।

” जैसे को तैसा ” वाली कहाबत के तहत  उक्त घटना से तमाम बीजेपी विरोधी राजनीतिक पार्टियां सीमांचल में बीजेपी के विरूद्ध मुखर हो उठी और बीजेपी के दलित विरोधी चेहरे को उजागर करने में लग गयीं।

कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि बीते मई महीने में बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों ने जिस तेजी से अपनी राजनीतिक गतिविधियों को बढ़ाने का प्रयास किया था , उसी तेजी से प्रशासनिक महकमे ने कांडों की सच्चाइयों का खुलासा करके किसी की भी कोई राजनीतिक दाल गलने नहीं दिया , लिहाजा , वैसे तत्वों की जमकर किरकिरी हुई।

सूत्र बताते हैं कि सीमांचल के क्षेत्रों में बीजेपी और उसके विभिन्न सहयोगी संगठनों की खासी राजनीतिक पकड़ है और दूसरी ओर ये दल बिहार की सत्ता में भी काबिज़ है लेकिन , ये जिस दल की अगुवाई में सरकार में शामिल है वह अगुआ दल और उसके नेता सीमांचल में नाममात्र के लिए भी इनकी कोई राजनीतिक दाल गलने देने के पक्ष में नहीं हैं। और , बताया जाता है कि यही कारण है कि सम्बद्ध जिलों की पुलिस ने मामलों का त्वरित अनुसंधान रिपोर्ट उजागर करते हुए किसी राजनैतिक दांवपेंच का कोई गुंजाइश नहीं छोड़ा।

हाल के वैसे चर्चित मामलों में से एक मे दर्ज एफआईआर के मुताबिक जल्दी जल्दी नामजदों की गिरफ्तारी होना , दूसरे मामले में सरकारी तंत्रों के अनुसंधान से ही शीघ्रता में वास्तविक दोषी का उजागर होना और तीसरे मामले में दलित महादलित तुष्टीकरण राजनीति के तहत बीजेपी के विधायक के विरूद्ध कार्यवाही शुरू हो जाना , इस बात का पुख़्ता सबूत है कि न सिर्फ गैर बीजेपी राजनीतिक दलों की मंशा बीजेपी की दाल नहीं गलने देने की रहती आ रही है बल्कि स्वयं बिहार की सत्ता के शीर्ष कुर्सी पर आसीन मुख्यमंत्री की भी यही मंशा बरकरार है। जिस कारण स्थानीय प्रशासन और पुलिस तंत्रों के द्वारा ऐसे मामलों का त्वरित निष्पादन किया जा रहा है।

चर्चा है कि  सजगता पूर्वक विधि व्यवस्था के संचालन में लगे पूर्णिया और किशनगंज के एसपी ने अपने अपने क्षेत्रों में घटित हर तरह की दलित महादलित उत्पीड़न की घटनाओं की वास्तविक सच्चाइयों का खुलासा समय पर करते हुए नापाक इरादों से लैश राजनीतिक मंसूबों को ध्वस्त करने का काम किया है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.