वस्त्रहीन राजा रंगा-बिल्ला को अपने कविता से कर कर दिया नंगा

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शव-बहिनी-गंगा
शव बहिनी गंगा

बिहार मंथन डेस्क

गुजराती कवयित्री पारुल खक्कर को गुजरात में सिर्फ उनके लिखे भजनो की बजह से ही जाना जाता था।  लेकिन हाल के दिनों में उनकी महज चौदह लाइन की कविता से वे एक ख़ास वर्ग के निशाने पर आ गई हैं।  उनकी कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हो रहा है।

गुजराती कवयित्री पारुल खक्कर की कविता में ऐसा क्या था कि पूरा भाजपा आई टी सेल उनके पीछे पड़ गयी । इन्हें सोशल मीडिया पर भद्दी-भद्दी गलियां दिया जा रहा है । परेशान होकर उन्हें अपनी फेसबुक को प्रायवेसी मोड में रखना पड़ रहा है ।

कवयित्री पारुल खक्कर की यह कविता केवल कल्पना नहीं है । यह प्रकृति, मनुष्य, उसकी आशाए आकांक्षाओं,  सुखों की कमी, दुखों और कष्टों का प्रतिबिंब है और आने वाले दिनों की ओर एक प्रकाश है। खक्कर की कविता इस बात का प्रतिबिंब है कि हम किस दौर से गुजर रहे हैं और सरकार कैसे जरूरत को पूरा करने में विफल रही है।

उन्होंने जो चित्रित किया है, इसका कोई जवाब नहीं है। इतनी सरल भाषा और लय में समझाया है । जिसे कोई भी बड़ी आसानी से समझ सकता है। उनकी कविता का संदेश बिलकुल साफ़ है । मुझे लगता है कि आने वाले समय में यह एक कविता उन्हें पूरे देश में क्रांति लाएगी।

प्रायोजित प्रचार से अलंकृत मूर्ति में दरारे दिखने लगी है। पारुल खक्कर की दमदार कविता ने हिला दिया, इसे बदलाव की कविता माना जा रहा है । रोज नए कपडे पहनने वाले  राजा की नग्नता  अवाम को दिखने लगी है।

पारुल खक्कड़ की कविता का हिंदी अनुवाद किया गया, कवयित्री ने जनभावना को बेबाकी से कविता के माध्यम से देश के सामने प्रस्तुत किया है। लेकिन इस कविता को लिखने के पीछे खक्कर का इरादा बिल्कुल भी राजनीतिक नहीं था. वे तो महज भारत की सबसे पवित्र और भारतीय संस्कृति की प्रतीक गंगा नदी में बह रहीं कोविड के शिकार लोगों की सौ के करीब लाशें देखकर व्यथित हो गई थीं.

हमें गर्व है ऐसे कवि और साहित्यकार आज भी है जो जनता को जगाने का काम करते हैं।

शव बहिनी गंगा

पारुल खक्कर

एक साथ सब मुर्दे बोले सब कुछ चंगा-चंगा

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे ख़त्म काष्ठ की बोरी

थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी

दर-दर जाकर यमदूत खेले मौत का नाच बेढंगा

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

नित लगातार जलती चिताएँ

राहत माँगे पल भर

नित लगातार टूटे चूड़ियाँ

कुटती छाति घर घर

देख लपटों को फ़िडल बजाते वाह रे बिल्ला-रंगा  

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति

काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थरए ना मोती

हो हिम्मत तो आके बोलो, मेरा साहेब नंगा

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

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