कोरोना काल में इस राजनैतिक नतीजों के मायने

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ममता-दीदी-मोदी-राहुल-गाँधी
कोरोना काल में चुनावी नतीजों

कृष्ण कुमार निर्माण (स्वतन्त्र लेखक और विचारक) ।

खेला होवै और हो गया पर परिवर्तन होवै नहीं हुआ।दीदी ओ दीदी, दो मई दीदी गई , दीदी गई जरूर मगर तीसरी बार विक्टोरिया हाल में चली गई। नतीजे आखिर नतीजे ही होते हैं और लोकतंत्र में इन्हें स्वीकार करना ही होता है लेकिन मजे की बात है जब गुजरात में विपक्ष पसीने छुड़वाता है

तब तर्क कुछ दूसरे होते हैं कि आखिर जीत तो जीत होती है क्योंकि वहाँ विपक्ष ने उस समय अपनी हार की नैतिक जीत बताया था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया मगर अब बिल्कुल उसी तरह से पश्चिम बंगाल में अपनी हार को भाजपा नैतिक जीत बताने से नहीं चूक रही

क्योंकि जो जीता वही सिकन्दर पर जब तमाम ताकत लगाने के बाद और सबसे बड़े नेता के ये कहने के बाद कि–इतनी भीड़ मैंने कभी जिंदगी में नहीं देखी।उसके बाद अपनी हार को आप जीत बताते हैं।

ख़ैर, जिस पार्टी से आप भारत मुक्त करना चाहते थे, वो असम में विपक्ष में होगी, केरल में भी सम्मानजनक स्थिति में है और तमिलनाडु में गठबंधन करके सत्ता प्राप्त कर चुकी है।

पुंडुचेरी में जहाँ कुल सीटें बहुत कम हैं, वहाँ भी उनका सुपड़ा साफ़ नहीं हुआ है। लेकिन हमें इन चुनावों के परिणामों को अलग नजरिए से देखने चाहिए।

पहला नजरिया यह होना चाहिए कि लेफ्ट जिन पर अक्सर देशद्रोही होने के आरोप लगते रहे हैं,वो देश से खत्म नहीं हुए हैं। दूसरा कांग्रेस का भविष्य है बशर्तें कि वो आपस में ना लड़कर एक रणनीति के तहत चुनाव लड़े तो मगर कांग्रेस ऐसा सम्भवतः ही कर पाए क्योंकि कांग्रेस को किसी ने खत्म नहीं किया बल्कि कांग्रेस ने खुद ही खुद को खत्म किया है और यदि ऐसा रहा तो यकीन मानिए शायद भविष्य में कांग्रेस पूरी तरह खत्म हो जाए।

तीसरा इस नजरिए से भी देखें कि यदि भाजपा ने खुद को कांग्रेस बनाने से नहीं रोका तो आप माने या ना माने भाजपा कांग्रेस से पहले खत्म हो जाएगी क्योंकि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल में भाजपा का अपना बड़ा चेहरा कौन है?

जो भी है वो आयातित है मतलब कांग्रेस कल्चर से है।इसको इस नजरिए से भी देखें कि यह दूसरा चुनाव है जब मोदी जी का जलवा धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और यकीनन ये भी मान लीजिए कि जिस तरह से राहुल जहाँ-जहाँ जाते हैं उनका उम्मीदवार चुनाव हार जाता है, ठीक उसी प्रकार अब जहाँ-जहाँ मोदी जी जाते हैं लगभग उनका उम्मीदवार चुनाव हार जाता है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश के चुनावों में भी ऐसा ही हुआ था। गजब की बात यह है कि 2014 के जब यह चल पड़ा था कि भाजपा जहाँ भी जाएगी वहाँ जीत जाएगी और इसे हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है लेकिन अब यह बदल गया है और सम्भवतः भविष्य में भी बदलने वाला लग रहा है क्योंकि याद रखिए जब आप सत्ता में रहकर खुद के वायदों को जुमले बताने लग जाएंगे तब जनता धीरे-धीरे आपको समझती हुई चली जाएगी

क्योंकि सत्ता के बाद काम भी करना पड़ता है,जो वायदे किए होते हैं,उन्हें पूरा भी करना चाहिए।ये तो गनीमत है कि विपक्ष में इस समय कोई ठीक-ठाक नेता नहीं वरना यकीन मानिए जो स्तिथि है वो नहीं होती। दूसरा विपक्ष बहुत धीमे तरीके से विपक्ष की भूमिका निभा रहा है। इसका क्या कारण है, ये तो वही बता पाएंगे पर राजनीति में निरन्तर लड़ने वालों की सदा जीत होती है।

वैसे राजनीति कभी सुधरेगी नहीं क्योंकि अब देखिए ना अगर चुनाव जितना ही विकास और काम पर मुहर है तो पश्चिम बंगाल का सन्देश क्या है?तमिलनाडु का सन्देश क्या है?केरल का सन्देश क्या है? असम का सन्देश क्या है? अब असम का सन्देश अगर विकास पर मुहर है तो फिर पश्चिम बंगाल की जीत विकास पर मुहर क्यों नहीं है?

हमारा मानना यह है कि असल में सारे के सारे नेता और पार्टियाँ एक जैसी हैं क्योंकि जो इस समय सिस्टम की पोल खुल रही है, उसमें सभी दोषी हैं मगर मानेंगे नहीं क्योंकि मानना नेताओं का काम नहीं होता बल्कि ये काम जनता का होता है। जैसे ही ये परिणाम आया तो यह बात भी चल निकली है कि अब ममता जी राष्ट्रीय राजनीति में कुछ कमाल करेंगी, जैसा कि बधाइयों से आभास हो रहा है

क्योंकि निश्चित रूप से राहुल योग्य होंगे पर विपक्ष उन पर एकमत नहीं है और ममता में राजनीति के वो सब गट्स हैं पर ये ध्यान रखिए यही बात एक बार मायावती के बारे में कही गई थी मगर आज वो कहाँ है?नीतीश कुमार के बारे में भी ऐसा कहा गया था मगर आज उनकी स्तिथि सब जानते हैं और मिस्टर केजरीवाल के बारे में भी ऐसा चला था मगर क्या हुआ, सब जानते हैं मगर ममता में निश्चित रूप से वो सब कुछ है मगर राष्ट्रीय राजनीति में या विपक्षी एकता के बारे वो क्या कर पाएंगी। ये आने वाला सांय बताएगा लेकिन इन नतीजों से इतना तय मान लीजिए कि भाजपा को भी हराया जा सकता है और बेशक आगे भी होती रहे मगर बहकावे की राजनीति अब बहुत दिन चलने वाली नहीं है और यदि राजनीति में कोई भी जनता के साथ मिलकर उनके मुद्दों को आवाज देगा तो वो निश्चित रूप से तमाम तरह के अवरोधों को पार करके सत्ता हासिल कर ही लेगा।

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