शिवांनद तिवारी का दो बार हुआ था ‘अपहरण’

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घर से लालू और चिडि़याखाना से नीतीश ‘उठा’ ले गये थे

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फाइल फोटो – नीतीश कुमार , लालू यादव , शिवानन्द तिवारी

—– वीरेंद्र यादव ——-

पूर्व सांसद हैं शिवानंद तिवारी। समाजवाद की सभी धाराओं के लिए ‘सुपाच्‍य’ हैं। अपनी शर्तों पर किसी धारा से परहेज नहीं। शनिवार को कई महीने बाद मुलाकात हुई।

करीब घंटे भर की मुलाकात में कई पुराने किस्‍से पर सुनाये। लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ मनभेद और मतभेद के बारे में चर्चा की।

बातचीत का तारतम्‍य तलाशने लगे तो हम इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि राजनीतिक सरोकारों के लिए उनका दो बार ‘अपरहरण’ किया गया, लेकिन जब उनकी ‘बगावत’ भारी पड़ने लगी तो ‘रिहा’ करने में भी संकोच नहीं किया।

बात विधायकों की संख्‍या से शुरू हुई। उन्‍होंने कहा कि इस बार अब तक के सबसे अधिक यादव विधायक जीते हैं। हमने कहा- पिछले बार 61 जीते थे, इस बार यादव विधायकों की संख्‍या 52 रह गयी है। 9 कम।

फिर उन्‍होंने कहा कि पहली बार सबसे अधिक यादव विधायक 67 में जीते थे, जब संविद सरकार बनी थी। इसके बाद काला कालेलकर आयोग, मंडल आयोग, मुंगरीलाल आयोग से लेकर रोहिणी आयोग तक बातचीत हुई।

कालेलकर आयोग ने 70 फीसदी तक आरक्षण की सिफारिश की थी। बात अतिपिछड़ों के आरक्षण पर आयी तो पंचायती राज में अतिपिछड़ों तक पहुंची।

विरेंदर यादव न्यूज़ ऐड

उन्‍होंने कहा कि इसी वर्ग को लेकर नीतीश कुमार ने समता पार्टी की स्‍थापना की थी। 1995 में विधायक कम ही जीते थे, लेकिन 42 अतिपिछड़ों को टिकट दिया गया था। यही वर्ग आधार बना।

पंचायत चुनाव के लिए आंदोलन की शुरुआत उनके नेतृत्‍व में हुआ था। इसकी पहली बैठक मुजफ्फरपुर में हुई। बड़ी संख्‍या लोग आये। इसके बाद चंपारण और फिर गया में सम्‍मेलन हुआ।

गया में एक पार्टी कार्यकर्ता ने बताया कि पार्टी अध्‍यक्ष की ओर से सम्‍मेलन में नहीं शामिल होने का निर्देश पार्टी पदाधिकारियों को भेज गया है।

इस बीच शिवानंद तिवारी पीरो में हुए उपचुनाव में विधान सभा के लिए समता पार्टी से चुन लिये गये थे।

गया सम्‍मेलन के बाद पार्टी में बगावत की शुरुआत हुई। समता पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष रघुनाथ झा के खिलाफ शिवानंद तिवारी का स्‍वर मुखर होने लगा था। इस बीच लालू यादव जेल से रिहा हो गये थे।

एक दिन लालू यादव आर बलॉक स्थि‍त उनके आवास पर पहुंच गये। काफी देर बैठे रहे। इस दौरान आसपास से बड़ी संख्‍या में बच्‍चे लालू यादव को देखने पहुंचने लगे।

लालू यादव ने बच्‍चों के लिए कपड़े और मिठाई मंगवाई। करीब दो घंटा बाद लालू यादव ने उनसे पूछा कि भाभीजी कहां हैं। दोनों घर के अंदर गये। लालू यादव ने भाभी जी से कहा कि इनको कहिए हमारे साथ चले आएं।

इनको जो चाहिए, सब मिलेगा। समता पार्टी नेतृत्व से खफा चल रहे शिवानंद तिवारी को घर से हरी झंडी मिल गयी। इसके बाद शिवानंद तिवारी तीन अन्‍य विधायकों के साथ समता पार्टी से छोड़कर राजद में शामिल हो गये।

बाद में उन्‍हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। इस प्रकार लालू यादव शिवानंद तिवारी को नीतीश कुमार के खेमे से उनके घर से ही ‘उठा’ कर अपने शिविर में लग गये।

करीब चार-पांच वर्षों तक सब ठीक चलता रहा। 2004 में शिवानंद तिवारी बक्‍सर लोकसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर उम्‍मीदवार बने, लेकिन यादव वोटरों ने उनका साथ नहीं दिया।

2005 का विधान सभा चुनाव भी निराशाजनक रहा। अब वे राज्‍यसभा जाना चाहते थे। लेकिन विभिन्‍न कारणों से अवसर उनके हाथ से फिसल गया।

2006 के राज्‍यसभा चुनाव के बाद राजद के खिलाफ शिवानंद तिवारी मुखर होने लगे थे। शिवानंद तिवारी की नाराजगी पर नीतीश कुमार की नजर थी।

शिवानंद तिवारी ने बताया कि एक दिन सुबह में चिडि़याखाना में टलहने के बाद बाहर निकले तो दरवाजे पर मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ललन सिंह और पीके शाही के साथ दिख गये। श्री तिवारी ने मुख्‍यमंत्री से पूछा- यहां क्‍या कर रहे हैं।

मुख्‍यमंत्री ने कहा कि आपका ही इंतजार कर रहे हैं। चलिए हमारे साथ। मुख्‍यमंत्री ने शिवानंद तिवारी को अपनी गाड़ी में बिठाया और पहुंच गये मुख्‍यमंत्री आवास। काफी देर तक मुख्‍यमंत्री आवास में मजमा लग रहा।

स्‍वाभाविक रूप से नीतीश कुमार ने लालू यादव की शिकायत भी की। इस बार शिवानंद तिवारी राजद छोड़कर जदयू में पहुंच गये थे।

2008 में उन्‍हें राज्‍यसभा भेजा गया, हालांकि 2014 में उन्‍हें फिर बेटिकट किया गया।

दोनों नेताओं ने जितनी से आत्‍मीयता से शिवानंद तिवारी को साथ ले गये, उतनी ही सहजता से त्‍यागने में संकोच नहीं किया।

वे कहते हैं कि 2014 में बक्‍सर से भाजपा की ओर से चुनाव लड़ने का ऑफर लेकर सरयू राय आये थे, लेकिन साफ शब्‍दों में मना कर दिया था। भाजपा के साथ जाने का सवाल ही नहीं है।

बातचीत के दौरान शिवानंद तिवारी ने इस बात को लेकर चिंता जतायी पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों को भाजपा की ओर जाना खतरनाक है, लेकिन इसको लेकर समाजवादियों में चिंता नहीं दिख रही है।

वोटों की शिफ्टिंग को रोकने कोई की पहल नहीं दिख रही है। वैचारिक धारा समाप्‍त होती जा रही है। इसका खामियाजा भी इसी वर्ग को भुगतना पड़ रहा है। वे कहते हैं कि पिछड़े और समाजवादी आंदोलन को लेकर व्‍यापक अध्‍ययन नहीं हुआ।

पत्रकार श्रीकांत और प्रसन्‍न कुमार चौधरी ने हिंदी में काफी काम किया है, जबकि अंग्रेजी में संतोष सिंह ने काम की शुरुआत की।

बातचीत में राजनीति और समाज के अन्‍य पक्ष पर चर्चा हुई। समाजवाद के दरकने और ढहने को लेकर भी मंथन हुआ।

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