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तेजस्वी-यादव-मदन-मोहन-अख्तरुल-इमान

जनता को उल्लू बनाने पर तूली राजद-कांग्रेस सहित एमआइएम के उम्मीदवारों के चयन में हुई मनमानी

कहीं हुई मुस्लिम उपेक्षा तो कहीं खेले जाएंगे सबर्ण कार्ड, योग्यता को नजरंदाज कर बाहुबलियों को प्रोत्साहन, तो दलितों की भी भारी उपेक्षा

तेजस्वी-यादव-मदन-मोहन-अख्तरुल-इमान
फोटो – बिहार विधान सभा चुनाव 2020 – कहीं हुई मुस्लिम उपेक्षा तो कहीं खेले जाएंगे सबर्ण कार्ड
  • सारे खेल देखने से मजबूत दीख रहा एनडीए
  • जनता को उल्लू बनाने पर तूली राजद-कांग्रेस सहित एमआइएम के उम्मीदवारों के चयन में हुई मनमानी से फिर सकता है परिवर्तन की उम्मीद पर पानी

सीमांचल ( अशोक / विशाल ) ।

विधानसभा चुनाव को लेकर सीमांचल पूर्णिया प्रमंडल के विधानसभा क्षेत्रों से उम्मीदवारों के रूप में नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाबजूद कांग्रेस की ओर से कई सीटों पर उम्मीदवार के नाम का खुलासा नहीं किया जा सका है तो दूसरी ओर सीमांचल की राह बिहार विधानसभा के सदन में कुछ संख्या बनाकर घुसने की ललक में जोरशोर से राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखा रही एआईएमआईएम की ओर से भी सीमांचल में खड़े किये जाने वाले उम्मीदवारों के नामों का खुलासा भी अभी तक नहीं किया जा सका है।

मुस्लिम बहुल क्षेत्र के रूप में बिहार भर में चर्चित सीमांचल को राजनीति के मानचित्र में अतिसंवेदनशील माना जाता रहा है।

जिस कारण इस क्षेत्र के चुनावी रिजल्ट सदैव चौंकाने वाले ही रहते आये हैं।

इस क्षेत्र का पुराना इतिहास है कि इस क्षेत्र में लाख प्रयत्न करने के बाद भी आरएसएस-भाजपा को मनमानी जीत हासिल नहीं हो पायी ।

आरएसएस-भाजपा ने इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी को पहले तो बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर हड़काया था और अब नागरिकता कानून एनआरसी-सीएए के नाम पर हड़काने की रणनीति तैयार किया गया , लेकिन , इस क्षेत्र को खौफ़ नहीं हुआ। क्योंकि , इसी की आड़ में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली राजनीतिक दलों कांग्रेस , राजद व अन्य ने ढ़ाल बनकर इनकी हिफाजत का ढ़ोंग हरेक चुनावों में करना शुरू कर दिया था।

कहना गलत नहीं हो सकता है कि ऐसी ही तुष्टीकरण की राजनीति के बदौलत इस क्षेत्र के बहुसंख्यक आबादी के वोट बैंक को बहला फुसला कर लूटा जाने लगा था ।

लेकिन , धीरे धीरे ही सही , लम्बे अंतराल के बाद इस अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र की बाढ़ और कटाव की सालाना त्रासदियों ने इस क्षेत्र के बहुसंख्यक आबादी की आंखें खोलनी शुरू कर दी।
इसी बीच हैदराबादी सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की इस सीमांचल में धमक हुई और उसके कर्ताधर्ता प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने उन खुलती आंखों में एमआइएम के बूते भविष्य के सुनहरे सपनों की उम्मीदें जगानी शुरू की।

इसी बीच सरकार ने नागरिकता कानून एनआरसी , एनपीआर और सीएए का आगाज़ कर दिया तो इस पार्टी को इस क्षेत्र में पांव पसारने और जमाने का मौंका बैठे बिठाये हाथ लग गया।

लिहाजा , घनघोर मेहनत करके अख्तरूल ईमान ने सीमांचल के 24 विधानसभा क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय के बीच एमआइएम का आकर्षण बढ़ा दिया।

विधानसभा चुनाव की घड़ी आ गई तो इस पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ने की होड़ मच गयी और हर उस शख्सियत ने जनाधार तैयार करने की जुगत भिड़ाते हुए अपना सब कुछ इस एमआइएम के लिये न्यौछावर करना शुरू कर दिया , जो चुनाव लड़ने की आकांक्षा के साथ अख्तरूल ईमान के नेतृत्व में एमआइएम के झंडे थाम लिये थे।

लेकिन , ऐसे अधिकांश एमआइएम नेताओं के मंसूबों पर तब पूरी तरह से पानी फिर गया जब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काबिज़ सीमांचल निवासी अख्तरूल ईमान ने पार्टी में त्याग की मूर्ति बनकर आये कर्मठ और जनाधार वाले नेताओं की जगह अपनी मनमानी पूर्ण ऐसे ऐसे एमआइएम के नेताओं को प्रत्याशी घोषित करने का काम कर दिया , जिससे , इस मुस्लिम बहुल सीमांचल में एक सवाल खड़ा हो गया कि ” कहीं सिर्फ कांग्रेस-राजद के महागठबंधन की हार और एनडीए गठबंधन की जीत के लिए तो इस एमआइएम पार्टी ने चुनाव में धमक नहीं दिया ” ।

ऐसा सवाल इसलिए खड़ा हुआ है कि इस एमआइएम पार्टी ने सीमांचल की उन्हीं विधानसभा सीटों पर तगड़े उम्मीदवार घोषित किए हैं , जहां , कांग्रेस सीटिंग हैं या कांग्रेस को मजबूत माना जाता रहा है।

इस कारण सीमांचल के हरेक विधानसभा क्षेत्र में कानाफूसी के तौर पर यह सवाल खड़े हो गए हैं कि आखिर इस एमआइएम की सीमांचल में चुनावी रणनीति क्या है।

स्मरणीय है कि जिस अमौर विधानसभा क्षेत्र की सीट से एमआइएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान स्वयं चुनाव लड़ने जा रहे हैं उस सीट से संबद्ध एक प्रखंड वैसा के पूर्व प्रखंड प्रमुख बाबर आजम और उस विधानसभा क्षेत्र के एक अन्य राजनीतिक हस्ती परबेज ने गत बुधवार को एमआइएम से त्यागपत्र दे कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली।

जाहिर सी बात है कि इस कारण सीमांचल में उपज रहे एमआइएम के प्रति निराशा में वृद्धि होगी ,इस बात की आशंका जताई जाने लगी है।

यह तो हमने सीमांचल जैसे बिहार के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल प्रमंडल की संशय में डूबती राजनीति की बात यहां बता दिया।

लेकिन , अगर , राज्य स्तर की बातें भी अगर हम कांग्रेस और मुसलमानों को लेकर कर लें तो यहां अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती है।

बिहार की कांग्रेस ने इस बार के विधानसभा चुनाव के आलोक में पूरी तरह से सवर्ण कार्ड खेलने का ही प्रयास किया है।

खबरों पर गौर करने से पता चला है कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के पहले फेज में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार घोषित नहीं किया।
दूसरे फेज के लिए महज़ तीन ही मुस्लिम उम्मीदवार घोषित किए।

और , तीसरे अंतिम फेज जो सीमांचल कोशी सहित विभिन्न क्षेत्रों में निपटाये जाने वाले हैं उसके लिस्ट जारी नहीं हो पाये हैं।

हो सकता है कि इस तीसरे फेज वाले मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार की संख्या ज्यादा हो जाये , लेकिन , यहां सवाल उत्पन्न हो गए हैं कि जहां से कांग्रेस की टिकट के लिए आईएएस अफसर रहे दिग्गजों की कतारें लगी थी , वहां , बाहुबलियों को उतारे जाने के स्पष्ट कारण आखिर क्या रहे होंगे।

जाहिर सी बात है कि कई सीटों पर इस बार कांग्रेस और राजद ने वैसे ही उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने का काम किया है जो अन्ततः एनडीए गठबंधन की भाजपा की जीत को ही अन्ततः आसान बनाने का काम कर देंगे।

बिहार की जनता की निगाहें बड़ी उम्मीद के साथ राजद-कांग्रेस की ओर टिकी हुई थी और इस दोनो पार्टी के अलावा सीमांचल में एमआइएम की ओर जनता की निगाहें टिकी हुई थी लेकिन अब लगता है कि सब गुड़–गोबड़ होके ही रहेगा और अन्ततः जनता को ही अपने मन मस्तिष्क से सीधा फैसला लेना पड़ेगा कि वह राज्य में अब नई सरकार गठित कराएगी या कुछ वर्ष और पुराने को ही सहन करने का प्रयास करेगी ।