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बिहार विधानसभा चुनाव और सीमांचल

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फोटो – बिहार विधान सभा चुनाव 2020 एवं सिमांचल

टिकट की मारामारी के बीच, खूब चली प्रतिद्वंद्वी की लंघी

लेकिन चली आलाकमानों की ही मनमर्ज़ी, इसकी टोपी उसके सिर वाली कहाबत हुई चरितार्थ

गठबंधन के चक्कर में सीटों का ही नहीं वल्कि दल और उम्मीदवार में भी हुआ हेरफेर

उम्मीदवार बनने की ललक में कईयों ने गंवाये लाखो लाख : और हो गए टिकट से वंचित

इस बार होंगे जमकर भीतरघात : कई सीटों पर होगी भाजपा-जदयू सहित राजद-कांग्रेस व एमआइएम की किरकिरी

सीमांचल ( विशाल/पिन्टू/विकास) ।

विधानसभा चुनाव के आलोक में सीमांचल के जिन जिन दलीय नेताओं ने पिछले पांच वर्षों की मेहनत और बहुत कुछ लुटाने के बाद राजधानी में पड़ाव डाला , आलाकमानों की दरबारों में नित्य हाजरियां दी , नेताओं के निजी आवासों तक के चौखटों को चूमा ,

राजधानी के फुटपाथों से लेकर आवासीय होटलों में कई कई दिनों तक रातों की नींद को करबटें बदल बदल कर उड़ाया , उन नेताओं की वर्तमान स्थितियां अब देखने और समझने लायक नजर आ रही है।

टिकट से वंचित हुए नेताओं ने अपने अपने क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी हैं।

नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई हैं तो ऐसे उम्मीदवारों में हड़बड़ी है।

पूर्णिया जिले के कसबा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व भाजपा विधायक और इस बार के भी टिकट के मजबूत दावेदार प्रदीप दास के रोते बिलखते वीडियो बायरल हो गए कि उनकी सीट को विना वजह एनडीए गठबंधन के नये सहयोगी दल ” हम ” को देकर उनके साथ अन्याय कर दिया गया।

” हम ” के उम्मीदवार के रूप में कसबा विधानसभा क्षेत्र से ” हम ” के पूर्णिया जिलाध्यक्ष राजेन्द्र यादव को एनडीए गठबंधन का प्रत्याशी घोषित किया गया है , जिन्हें , विधानसभा क्षेत्र के कई क्षेत्रों की जनता ठीक से पहचानती भी नहीं है

और उस पर तुर्रा यह कि कसबा विधानसभा क्षेत्र के भाजपाइयों ने उनकी उम्मीदवारी सामने आने के बाद विरोध का स्वर अलापना शुरू कर दिया है।

भाजपाइयों का कहना है कि भाजपा के पाले में ही वर्षों से रहती आ रही कसबा की सीट से प्रदीप दास की जगह दूसरे किसी ऐसे भाजपा नेता को ही उम्मीदवार बनाया जाता तो श्रेयस्कर होता ।

वैसे , क्षेत्र में भाजपा नेता संजय मिर्धा को उम्मीदवारी सौंपने की मांग को लेकर कसबा के भाजपाई पटना पहुंच एनडीए मुख्यालय में जोर आजमाइश में लगे हैं।

उसी प्रकार अररिया के फारबिसगंज सीट को राजद से कांग्रेस ने छीन कर राजद के प्रत्याशी के रूप में चुनावी तैयारी कर चुके अररिया के कद्दावर अधिवक्ता और राजद प्रदेश कमिटी के नेता के एन विश्वास के हौंसले पस्त कर दिये गए।

जबकि पूर्णिया के अमौर की विधानसभा सीट को भी भाजपा से छीनकर जदयू अमौर में सामने आ खड़ी हुई है लेकिन उम्मीदवार के चेहरे भाजपाई ही रखे गए हैं।

भाजपा के पूर्व विधायक सबाजफर जदयू के उम्मीदवार घोषित कर दिये गए हैं।

वहीं , पूर्णिया के धमदाहा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की दावेदारी वाली सीट समझकर पूर्व कांग्रेस विधायक अमरनाथ तिवारी ने जमकर जनसम्पर्क अभियान चलाया लेकिन बाद में तब औंधे मुंह गिरे जब राजद ने उस सीट को अपनी पुरानी सीट बताते हुए वहां से पूर्व विधायक दिलीप यादव को बतौर राजद प्रत्याशी राजद सिम्बल थमा दिया।

उसी प्रकार पूर्णिया जिले के ही बायसी की सीट पर उम्मीदवार के अभाव में जदयू ने अपने पांव पीछे खींच कर भाजपा को भाग्य आजमाने का अवसर प्रदान किया।

वहीं , भाजपा को किशनगंज की सदर विधानसभा सीट पर उम्मीदवार का चयन करने में भाजपा के लोकल विधानपार्षद डॉ दिलीप जायसवाल की आकांक्षाओं को तरजीह देने की मजबूरी में परेशानी झेलनी पड़ रही है।

किशनगंज की सीट पर प्रबल दावेदारी भाजपा नेता राजेश्वर वैद की इस बार रही ,जिसे भाजपा के दिग्गजों शाहनवाज हुसैन सहित नन्द किशोर यादव का प्रबल समर्थन भी दिखा लेकिन पुराने प्रत्याशी स्वीटी सिंह के लिए सुशील कुमार मोदी और डॉ दिलीप जायसवाल ने टांगे फंसा दी है।

यही स्थिति बहादुरगंज की भाजपा वाली सीट पर भी दिखाई दे रही है , जहां , लक्ष्मी पण्डित नामक भाजपा के एक पुराने विद्रोही को भाजपा का उम्मीदवार घोषित कराने के लिए जीतोड़ प्रयास किए जा रहे हैं , जबकि , उक्त सीट पर भाजपा का वर्षों से अलख जगाने का काम करनेवाले पवन अग्रवाल की उम्मीदवारी को बहादुरगंज के भाजपाइयों ने सटीक माना था और पवन अग्रवाल के लिए अभी भी पटना में जीतोड़ प्रयास जारी दीख रहे हैं।

अब हम बस इतना बता देते हैं कि उम्मीदवार और दल की सेटिंग में इस बार जिस जिस दल ने पटना से ही मनमानी दिखा दी है उन सभी को भयंकर भीतरघात का सामना इस चुनाव में करना पड़ेगा ।

सीमांचल में इस बार के विधानसभा चुनाव से राजनीति की मुख्यधारा में आयी एमआइएम के उम्मीदवारों के चयन में हुई हेराफेरी से सीमांचल में एमआइएम के बैनर झंडे लेकर उथल पुथल की राजनीतिक हरहोर मचाने वाले एमआइएम नेताओं में भी एमआइएम के नेतृत्व के प्रति भारी आक्रोश पनपता दिखाई दे रहा है।

कहते हैं कि एक ओर 13 अक्टूबर से उम्मीदवार के नामांकन की प्रक्रियाएं इस सीमांचल में शुरू हैं तो दूसरी ओर पार्टी नेताओं ने अभी तक अपनी लड़ने वाली सीटों पर लड़ने जा रहे एमआइएम के उम्मीदवारों का नाम तक खुलासा नहीं किया है।