टिकट-की-खातिर-उठापटकसिमांचल-में-राजनेताओं-की-श्रृंखलाबद्ध-मौतराजकुमार-चौधरी-रघुवंश-बाबु-को-श्रधांजली-देते
मांग-के-अनुरूप-टिकट-नहीं-दिये-जाने-पर

सीमांचल : मांग के अनुरूप टिकट नहीं दिये जाने पर हो सकता है बेड़ा गर्क

जोकीहाट से पूर्णिया , किशनगंज तक की जनता वेट एंड वॉच की स्थिति में

डॉ-अबू-सायम-राज-कुमार-चौधरी
फोटो – जनता की मांग के अनुरूप टिकट नहीं मिलने पर हो सकता है बड़े पार्टियों का हो सकता है बेड़ा गर्क

सीमांचल ( अशोक / विशाल ) ।

सीमांचल : विधानसभा चुनाव में पूर्णिया सदर की विधानसभा सीट से राजद उम्मीदवार के रूप में राजकुमार चौधरी की मांग लगातार जोर पकड़ती जा रही है तो किशनगंज की सदर विधानसभा सीट से राजद की टिकट पर नन्हा मुश्ताक़ को खड़ा करने की मांग जोरों से जारी हैं।

कहा जा रहा है कि ऐसा नहीं किये जाने पर इन दोनों सीटों पर महागठबंधन की लुटिया गर्क हो सकती है।

इसी प्रकार भाजपा के ख़ेमे से किशनगंज सदर की विधानसभा सीट पर भाजपा के पूर्व किशनगंज जिलाध्यक्ष राजेश्वर वैद को उम्मीदवारी प्रदान करने की मांग है तो उधर , बहादुरगंज की विधानसभा सीट से भाजपा का टिकट भाजपा नेता सह बहादुरगंज नगर पंचायत के पूर्व चेयरमैन पवन अग्रवाल को प्रदान करने की मांग बहादुरगंज भाजपा की ओर से की गई है।

इन मांगों को लेकर भाजपाइयों का भी स्पष्ट रूप से कहना है कि अगर इस बार के चुनाव में भाजपा ने जनता की मांग के अनुकूल उम्मीदवारी नहीं दी तो किशनगंज जिले में इस बार फिर भाजपा का खाता खुलना दुष्कर हो जायेगा।

राजद और भाजपा की तर्ज पर ही तीसरी ओर टिकट की मारामारी से संत्रस्त एमआइएम की नैया पार लगाने की जिद्द में सीमांचल की बहुसंख्यक मुस्लिम जनता उताबली बनी हुई है और एमआइएम की टिकट जोकीहाट से गुलशन आरा को , बायसी से पूर्व विधायक रूकनुद्दीन को , कसबा से कंचन देवी को देने की मांगें कर रही हैं।

स्मरणीय है कि विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सीमांचलवासियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा-जदयू गठबंधन एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के द्वारा विभिन्न योजनाओं के शिलान्यास और उदघाटन समारोह की धूम मची हुई है

तो दूसरी ओर विपक्षी दलों राजद-कांग्रेस के महागठबंधन में सीट शेयरिंग के पेंच ही उलझे हुए हैं और एमआइएम की ओर से भी अभी तक सीमांचल के विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा खटाई में पड़ी हुई है।

राजद-कांग्रेस और एमआइएम के उम्मीदवार घोषित करने में हो रही देरी से भावी उम्मीदवारों के हौंसले टूटने लगे हैं , क्योंकि , उपरोक्त चर्चित विपक्षी दलों के बीच सीट शेयरिंग के पेंच लगातार फ़ंसे हुए ही नजर आ रहे हैं , दूसरे , आलाकमानों के इर्द गिर्द मंडराते रहने वाले कतिपय पार्टी नेताओं के द्वारा टिकटार्थियों को दिमागी टेन्सन देकर उन्हें हतोत्साहित करने का काम भी किया जा रहा है।

यूं तो एनडीए गठबंधन के भाजपा-जदयू में भी टिकटार्थियों की लम्बी भीड़ जमा हो गई है लेकिन इस मामले में भाजपा के टिकटार्थी अपनी पार्टी के समक्ष विल्कुल अनुशासित रूप में खड़े हैं , कोई हो-हल्ला और उठापटक की स्थिति नहीं है ।

मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण भाजपाई इस सीमांचल में उम्मीदवारी के लिए आपस में कोई उठापटक नहीं कर रहे हैं और पार्टी के फैसलों को ही शिरोधार्य करने का मन बनाये हुए हैं।

भाजपाई ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें इस सीमांचल से 2015 के विधानसभा चुनाव में अकेले अपने बूते जो 5 सीटें मिली थी , उसके रिन्यूअल की चिंता उनमें घर की हुई है । हालांकि , भाजपाई इस चिंता के साथ आश्वस्त भी हैं कि सीमांचल से उन्हें हर हाल में उनकी पिछली बार की जीती हुई सीटें फिर से आसानीपूर्वक ही हांसिल हो जाएंगे।

भाजपाइयों की इस संभावना को इस बार जदयू के साथ रहने के कारण पूरा बल मिल रहा है और भाजपाइयों में इस कारण कुछ सीटें बढ़ने की आस भी जगी हुई है।

लेकिन , बड़ा सवाल यहां पर यह भी पैदा हो रहा है कि सीमांचलवासियों में बिहार की सत्तारूढ़ दल जदयू के प्रति जो नाराज़गी उत्पन्न है , उस कारण जदयू को पिछले 2015 के विधानसभा चुनाव में मिली 6 सीटें इस बार वापिस मिलेंगी या नहीं।

पिछली बार जदयू ने राजद और कांग्रेस के गठजोड़ की ताकत पर सीमांचल के पूर्णिया , किशनगंज और अररिया जिलों से दो दो सीटें हांसिल किया था।

इस बार इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र में वह भाजपा को साथ लेकर वोट मांगने आने वाली है और इस क्षेत्र में एनआरसी-सीएए के मुद्दे ज्वलंत बने हुए हैं , तो , यह सवाल खड़े हो गए हैं कि इस सीमांचल से जदयू की झोली में 2015 से पड़े वह 6 सीटें अबकीबार के चुनाव में बच पाएंगी कि नहीं।

यहां स्मरणीय है कि भाजपा ने भले ही 2015 के चुनाव में सीमांचल के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल क्षेत्र किशनगंज जिले से एक भी सीट प्राप्त नहीं किया था लेकिन , जदयू के लिये उस चुनाव के दौरान सीमांचल का कटिहार जिला शर्मनाक सावित हुआ था क्यों कि 2015 के विधानसभा चुनाव में कटिहार जिले से जदयू को शून्य पर आउट होना पड़ा था।

इस बार के आने वाले विधानसभा चुनाव में एक ओर बदलाव की आकांक्षा की गूंज सुनाई दे रहे हैं तो दूसरी ओर उम्मीदवार के चयन प्रक्रिया में पुराने घिसे पिटे उम्मीदवारों को दरकिनार करने की चेतावनी जनता की ओर से मिल रही है।

मतलब यह कि सीमांचल में कुछ ऐसी भी सीटें हैं जहां से डिमांड में महागठबंधन की राजद सर्वोपरि है लेकिन उम्मीदवार के चेहरे बदलने पर भाजपा भी प्रिय हो जा सकते हैं लेकिन इस बार जदयू तो विल्कुल ही नापसंद बनी हुई है।

जाहिर सी बात है कि सीमांचल में इस बार जदयू की जगह एमआइएम सीमांचलवासियों की बहुसंख्यक आबादी के बीच पसन्दीदा पार्टी बनती नजर आ रही है।

लेकिन , राजद की उफ़ान को और उस उफ़ान के मद्देनजर राजकुमार चौधरी और नन्हा मुश्ताक़ को टिकट देने की मांग को इस क्रम में नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

राजद ने प्रत्याशी के चयन प्रक्रिया में अगर सीमांचल की जनता की मांगों के अनुरूप ही उम्मीदवार को उतारा तो राजद के परचम को लहराने से कोई रोक नहीं सकता है। अन्यथा बेड़ा गर्क भी हो जा सकता है।

सीमांचल के पूर्णिया सदर विधानसभा सीट पर राजद के उम्मीदवार के रूप में राजद व्यवसायी प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष सह वैश्य समाज के प्रांतीय नेता राजकुमार चौधरी को उतारने की मांग लम्बे दिनों से हो रही है।

सीमांचल के किशनगंज सदर विधानसभा क्षेत्र से भी राजद प्रत्याशी के रूप में लंबे समय से एम के रिजबी उर्फ नन्हा मुश्ताक़ को ही उतारने की मांग जारी है