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किशनगंज जिले में भाजपा को स्थापित करने की ललक

किशनगंज जिले में लगातार शून्य पर चल रही भाजपा को इस बार स्थापित करने के लिए बहादुरगंज से पवन अग्रवाल और किशनगंज सदर से राजेश्वर वैद की महत्वाकांक्षा को करनी होगी पूरी

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फोटो – बहादुरगंज से पवन अग्रवाल और किशनगंज सदर से राजेश्वर वैद
  • दोनो चेहरे की पहचान बनी है सेक्युलर : मुस्लिम समाज का भी मिलेगा समर्थन

सीमांचल ( अशोक / विशाल ) ।

आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में सीमांचल के मतदाताओं के रोलमॉडल के स्वरूप किस तरह से सामने आएंगे , यह तो अभी बताना श्रेयस्कर नहीं हो सकता है लेकिन इतना तय माना जा रहा है

कि एनडीए गठबंधन की भाजपा को इस सीमांचल में तब तक नुकसान नहीं हो सकता है , जबतक कि गैर भाजपाई पार्टियां राजद और कांग्रेस अच्छे सेक्युलर चेहरे को उतारने में दिलचस्पी नहीं दिखाएगी।

अगर पुराने घिसे पिटे चेहरे पर ही राजद और कांग्रेस ने इस सीमांचल में दाव आजमाया तो निःसन्देह भाजपा अपनी पिछली 2015 वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम को फिर से दोहराने में सफल हो जाएगी।

उधर , भाजपा की सहयोगी पार्टी जदयू के लिए भी सीमांचल में खतरे की घन्टी बजती दिखाई दे रही है।

जदयू ने 2015 के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सीमांचल के कुल 24 सीटों में से 6 सीटें हांसिल किया था तो राजद , कांग्रेस के गठबंधन के ही बूते।

तुर्रा यह कि कटिहार जिले में तब भी जदयू को एक भी सीट नहीं मिली थी। पूर्णिया ,किशनगंज और अररिया से ही दो दो सीटें जदयू को हासिल हुए थे।

भाजपा उस 2015 के चुनाव में जदयू , कांग्रेस व राजद के प्रबल विरोध के बाबजूद इस सीमांचल के 4 सीटों को कब्जा किया था और उसमें तुर्रा यह रहा था कि भाजपा को कटिहार की सदर विधानसभा क्षेत्र वाली एक सीट मिली थी और पूर्णिया व अररिया से क्रमशः दो और एक सीट हांसिल की थी ।

2015 के चुनाव में भाजपा को किसी सबल पार्टी के सहयोग का अभाव था लेकिन फिर भी अकेले अपने बूते इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र से 4 सीटों पर कब्ज़ा कर भाजपा ने एक रिकॉर्ड बनाया तो इसे कमतर करके आंका नहीं जा सकता है।

जबकि इस मुस्लिम बहुल सीमांचल में राजद व कांग्रेस के साथ रहे चुनावी गठबंधन के बूते 2015 में 6 सीटें कब्जा करने वाले जदयू के एनडीए गठबंधन में भाजपा के साथ इस बार जारी गठबंधन के बूते जदयू को एनआरसी के उबाल खा रहे मुद्दे के कारण उतने सीट हांसिल होंगे कि नहीं , यह सवाल लगातार निरुत्तर बना नजर आ रहा है।

लेकिन , भाजपा के मूलधन में ह्रास होने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं दे रही है।

सीमांचल के पूर्णिया जिले में भाजपा दो सीटिंग सीटों पूर्णिया सदर और बनमनखी(सु०) पर लड़ेगी , यह तय माना जा रहा है।लेकिन इसके साथ साथ पूर्णिया की कसबा सीट पर भी भाजपा के लड़ने के मजबूत आसार हैं।

अररिया जिले की सिकटी सीट पर भी भाजपा के लड़ने के आसार हैं लेकिन फिलबक्त भाजपा की सीटिंग सीट अररिया जिले में फारबिसगंज है जहां भाजपा के विधायक हैं।

कटिहार के जिला मुख्यालय की कटिहार सदर विधानसभा सीट पर भाजपा के फिलबक्त सीटिंग विधायक हैं।

लेकिन , किशनगंज जिले में 2015 के चुनाव में भाजपा शून्य पर आउट रही।

अब इस बार बिहार के सर्वाधिक बड़े मुस्लिम बहुल क्षेत्र के रूप में ख्यात इस किशनगंज जिले में ही भाजपा के लक्ष्य हैं कि वह अपनी पार्टी के लोकप्रिय सेक्युलर चेहरे को किशनगंज सदर और बहादुरगंज से उतार कर जीत का ऐतिहासिक उपाय कर ले।

बताया जाता है कि उक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किशनगंज की किशनगंज सदर विधानसभा सीट पर उतारने के लिए भाजपा के पास राजेश्वर बैद नामक सर्वमान्य नेता हैं तो बहादुरगंज की सीट के लिए भाजपा के पास पवन अग्रवाल जैसे लोकप्रिय सेक्युलर नेता हैं।

पवन अग्रवाल 1990 से भाजपा में हैं लेकिन मुस्लिम समाज के प्रिय रहने के कारण ही बहादुरगंज नगर पंचायत के दो बार चेयरमैन निर्वाचित हुए।

वह 2007 में नगर पंचायत बहादुरगंज के चेयरमैन बने थे और फिर 2019 में चेयरमैन निर्वाचित हुए। यह अलग बात है कि फिलबक्त कुछ कारणवश चेयरमैन पद का मामला न्यायालय में विचाराधीन है और फिलबक्त पवन अग्रवाल बतौर वार्डपार्षद ही जनता की सेवा में लगे हुए हैं।

विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई देने के बाद पवन की चुनावी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगी और बहादुरगंज की सीट से भाजपा के उम्मीदवार बनने के लिए व्याकुल हो उठे।

बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र में कुल वोटरों की संख्या 2 लाख 86 हजार है , जिसमें से 97 हजार वोटर हिन्दू समाज के हैं।

उनका मानना है कि कम वोट बैंक के बाबजूद वह जीत की उम्मीदें इसलिए रखते हैं कि वह अपनी उम्मीदवारी के दौरान पहला काम भाजपा के वोट पोलिंग परसेंटेज को बढ़ाने का करेंगे और दूसरे वह अपने प्रिय मुस्लिम समुदाय के समर्थकों , साथियों को अपनी व्यवहार कुशलता के बूते भाजपा का वोट बैंक बनाने का सफल प्रयास करेंगे।

पवन अग्रवाल का कहना है कि बहादुरगंज से लगातार चार चुनाव जीतने वाले कांग्रेस विधायक से नाराज चल रही जनता इस बार सीधे बदलाव की मूड में है और भाजपा के पास यही इस बार का सुनहरा मौका है।
बहादुरगंज में वोटों के बंदरबांट कांग्रेस और एमआइएम के बीच जब होंगे तो भाजपा बीच से बाज़ी मार सकती है।
बहरहाल , यह अब भाजपा आलाकमान पर निर्भर है कि वह भाजपा की लड़ने वाली बहादुरगंज की सीट से पवन अग्रवाल को टिकट देकर मैदान में उतरने का मौका देती है या फिर चार बार से हारते आने वाले वही पुराने घिसे पिटे उम्मीदवार अबध बिहारी सिंह को ही इस बार भी उम्मीदवारी प्रदान कर भाजपा के लक्ष्य को धूलधूसरित करती है।

स्मरणीय है कि किशनगंज सदर विधानसभा की सीट से पिछले सभी विधानसभा चुनावों में शिकस्ती झेलने वाली स्वीटी सिंह के कदम इस बार पीछे हो गये हैं और उनके पूर्व विधायक पति सिकंदर सिंह ने भाजपा आलाकमान से ठाकुरगंज की सीट से सीधे उन्ही को चुनाव लड़बाने का गुहार लगाया है।

ऐसी स्थिति में अब सिर्फ राजेश्वर बैद ही चुनावी युद्ध के मैदान में उतरने लायक एक सेक्युलर भाजपाई चेहरा भाजपा से किशनगंज की सीट पर लड़ने वाले सर्वमान्य उम्मीदवार नजर आ रहे हैं।

अब इस बार यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा आलाकमान की ओर से बहादुरगंज की सीट के लिए पवन अग्रवाल और किशनगंज की सीट के लिए राजेश्वर वैद के चयन किये जाते हैं या नहीं।