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सुयोग्य उम्मीदवार की तलाश में बगलें झांकती किशनगंज कांग्रेस

सीपीआई के पूर्व किशनगंज प्रत्याशी फिरोज आलम के कांग्रेस की भेंट चढ़ने की हो रही है चर्चा, किशनगंज विधानसभा क्षेत्र के पिछले उप चुनाव की एक गलती से किशनगंज की सीट पर उम्मीदवार के पड़ गए हैं लाले

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फोटो – कांग्रेस को नीतीश कुमार की तरह दूसरे दल के भीतर से खींच लाना होगा किसी सुयोग्य नेता

सीमांचल ( अशोक कुमार )।

जैसे जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहा है वैसे वैसे राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म होता जा रहा है। इन्ही चर्चाओं और राजनीतिक परिदृश्य के बीच सक्षम और सुयोग्य कांग्रेस लीडर का अचानक हुआ अभाव किशनगंज विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस जनों को आज बुरी तरह से अखड़ता दिखाई दे रहा है ।

चुनावी राजनीति के अंतर्गत एक अदद सुयोग्य कांग्रेस लीडर के खालीपन को दूर करने के लिए किशनगंज की कांग्रेस छटपटाती हुई भिखमंगी की दहलीज़ पर आ खड़ी हुई है , लेकिन , किशनगंज में इसकी पूर्ति की सम्भावना किसी ओर से नजर ही नहीं आ रही है।

किशनगंज विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस परिवार के बीच से किसी का नाम भावी नेता के रूप में सामने आता है तो वह सीमित क्षेत्र का अनजान व्यक्ति सावित होता है अथवा कांग्रेस के किशनगंज सांसद डॉ जावेद आज़ाद के पारिवारिक सदस्यों या रिस्तेदारों में से कोई एक निकलता है।लेकिन यहां पर यह बता देना लाजिमी है कि कांग्रेस सांसद ने परिवारवाद के लांक्षन से बचने के लिए पहले से ही यह घोषणा कर रखा है कि उनसे रिश्तेदारी रखने वाले में से किसी भी व्यक्ति को कांग्रेस की उम्मीदवारी नहीं दी जायेगी।

ऐसी स्थिति में एक अदद सुयोग्य भावी कांग्रेस उम्मीदवार की खोज सही में लाजिमी मानी जा रही है।

आज किशनगंज विधानसभा क्षेत्र में जिस प्रकार कांग्रेस नेतृत्व की कमी दिख रही है इससे साफ पता चलता है कि शिक्षा के क्षेत्र में हो या, व्यवसाय के क्षेत्र में , या फिर राजनीतिक क्षेत्र में, किस प्रकार एक सोची समझी साजिश के तहत, यहाँ की जनता की अदूरदर्शिता के कारण किशनगंज में उस कांग्रेस के  राजनीतिक नेतृत्व के खालीपन का अहसास हो रहा है जिस कांग्रेस को किशनगंज विधानसभा क्षेत्र के आम चुनाव में कभी पराजय का मुंह देखना नहीं पड़ा ।

सिर्फ एक पिछले उप चुनाव में किशनगंज की सीट पर तब कांग्रेस की पराजय हो पायी जब 2015 के विधानसभा आम चुनाव में इस सीट से निर्वाचित कांग्रेस विधायक डॉ जावेद आज़ाद 2019 का संसदीय चुनाव कांग्रेस की टिकट पर जीत कर सांसद निर्वाचित हुए और इस विधानसभा क्षेत्र की खाली हुई सीट पर हुए विधानसभा उप चुनाव में सांसद जावेद ने जब अपनी अति वृद्ध माता सईदा बानो को बतौर उम्मीदवार ला कर खड़ा कर दिया तो सांसद पर परिवार वाद का आरोप उछला और कांग्रेस के हाथ से इस सीट को एमआइएम के कमरुल होदा ने छीन लिया ।

परिणामस्वरूप , इसका नतीजा यही हुआ कि कांग्रेस ही आज कांग्रेस के लीडर ढूंढने में व्यस्त हो गई है। उल्लेख्य है कि किशनगंज की राजनीति में विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्तित्व मायने रखती आयी है और यहां बड़ी पार्टी के नेता हो कर भी कइयों को कमज़ोर व्यक्तित्व के कारण चुनाव हारने के दंश झेलने पड़ गए हैं ।

जिस क्रम में चुनाव के समय लोग मतदान के बजाए मज़बूरी दान पर विवश हो जाते रहे हैं। 

यहां गौरतलब है कि किशनगंज विधानसभा का जातीय समीकरण भी प्रारंभ से ही अजीबोगरीब रहा है। अन्य विधानसभा क्षेत्र में जिस अनुपात में हिन्दू मुसलमान वोटर्स होते हैं उसी अनुपात में इस किशनगंज विधानसभा क्षेत्र में सुरजापुरी और गैर सुरजापुरी जाति के वोटरों की जनसंख्या है।

लेकिन यह घोर आश्चर्यजनक बात है कि इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे कम शिक्षा का प्रतिशत होने के कारण  यहाँ के लोग स्वतः स्फूर्त  एकजुट रहे हैं और साम्प्रदायिक शक्तियों को पराजित करते आये हैं। जैसा कि पिछले कई चुनावों में देखा गया है लोग आँख बन्द करके काँग्रेस को वोट देते आए हैं।

 लेकिन ,आज की तारीख में उसी किशनगंज में मुसलमान वोटर्स को कांग्रेस की ओर से कंफ्यूज करके एमआइएम जैसी पार्टी ने अपना सिक्का जमाने में कामयाबी हासिल कर ली है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेस के द्वारा महज़ एक उप चुनाव में  गलतीवश लायक और मज़बूत उमीदवार किशनगंज के चुनाव में नहीं देने से जनता में जो कांग्रेस के प्रति निराशा स्थापित हुई उसके सुधार के लिए कांग्रेस के पास एक अदद सर्वमान्य नेता का घोर अभाव हो गया है।

जानकारों का मानना है कि इसके लिए पार्टी आलाकमान को इस विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में उचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बहुत ही एहतियात से काम लेना होगा। किशनगंज काँग्रेस पार्टी को जिस एक अदद चर्चित , लोकप्रिय और तजुर्बाकार कैंडिडेट   की तलाश है , उसे दूसरे किसी दल  से लाये गये शिक्षित नेता के जरिये पूरी करनी होगी।

क्योंकि अब तक जितने भी कांग्रेस पार्टी के दावेदार नज़र आ रहे  हैं उन सभी में  कैंडिडेट के संस्कार कम और ठसक दिखाने के संस्कार ज्यादा नजर आ रहे हैं । जेब में पैसा और पार्टी का झण्डा से यहाँ पर कांग्रेस की समस्याओं का समाधान नहीं है।

सभी दावेदार कैंडिडेट के प्रोफाइल को देखा जाए तो किसी के पास शैक्षणिक योग्यता की कमी है, किसी को तजुर्बा नहीं है, किसी को सीमित पंचायत स्तर पर ही लोग जानते हैं, किसी की छवि विधानसभा प्रत्याशी के रूप में लोगों को कबूल नहीं है, किसी को पोठिया प्रखण्ड के लोग तो जानते हैं लेकिन दूसरी तरफ किशनगंज शहर और आसपास के लोग विल्कुल ही नहीं जानते हैं

ऐसी स्थिति में पता चला है कि किशनगंज की कांग्रेस ने उम्मीदवार की तलाश में एक फ़िरोज़ आलम की ओर भी नजरें दौड़ाया है । बताया जाता है कि फिरोज ने पिछले किशनगंज विधानसभा उप चुनाव में बतौर सीपीआई उम्मीदवार किशनगंज से अपना भाग्य आजमाया था और तभी से किशनगंज की राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ी है ।

अगर यह बात सत्य है कि किशनगंज की कांग्रेस की निगाह फिरोज की ओर भी गई है तो निःसन्देह कांग्रेस के लिए किशनगंज की सीट पर फिरोज से बेहतर कोई अन्य कैंडिडेट नहीं हो सकता है। जेएनयू के प्रोडक्ट इस पूर्व छात्र  में अपने क्षेत्र किशनगंज के लिए एक बेहतरीन राजनीतिक सोच और विज़न रखने की क्षमता हैं। 

पिछले साल विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं युवाओं और गाँव से लेकर शहर तक लोगों में  एक पहचान भी कायम हो चुकी है,  कन्हैया कुमार के साथ एक पोठिया और किशनगंज शहर में दो बड़ी सभाएं करा चुके हैं आम जनता तक अपनी पकड़ और पहचान मज़बूत कर लिए हैं। एक कर्मठ और अनुभवी कैंडिडेट होने के कारण किशनगंज विधानसभा सीट निकालने की क्षमता से परिपूर्ण हैं। चूंकि ये सीट कांग्रेस पार्टी के खाते में है इसलिए यहाँ की विकास और जिस प्रकार विरोधी पार्टियों के जड़ मज़बूत हो रहे हैं, इन सभी पहलू को ध्यान में रखते हुए साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने वाला योग्य उमीदवार माना जा सकता है ।