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नीतीश के अहंकार की भेंट चढ़ गए प्रधान सचिव संजय कुमार (भाप्रसे)

मंगल पांडेय को हटाने की बजाय स्वास्थ्य विभाग के इमानदार प्रधान सचिव संजय कुमार का तबादला कर दिया गया. उनकी जगह विवादित अधिकारी उदय सिंह कुमावत को प्रधान सचिव बना दिया गया है।

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फोटो – श्री संजय कुमार , भाप्रसे

फ़ज़ल इमाम मलिक

बिहार के मुख्य मंत्री को अगर हटाना ही था तोबिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय को उनके पद से हटाया जाना चाहिए था, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार को ही पद से हटा डाला, जबकी राज्य में कोविद -19 के खिलाफ लड़ाई में कुमार सबसे आगे थे और बहुत ही अच्छा काम कर रहे थे । संजय कुमार 1990-बैच के आईएएस अधिकारी हैं जिनकी 1993 बैच के अधिकारी उदय सिंह कुमावत के साथ पदों की अदला-बदली हो चुकी है ।

कोरोना काल में मंगल पांडेय का सेवेदनहीन चेहरा तो सामने आया ही था, लगातार गलत आंकड़े भी वे साझा करते रहे थे जिससे बिहार में भ्रम की स्थिति पैदा होती रही थी । चमकी बुखार के वक्त भी मंगल पांडेय, मंगल गान में लगे हुए थे और कोरोना काल में भी विज्ञान को झुटलाते हुए घंटी, थाली बजा और हवन कर कोरोना को भगाने की बात करते रहे हैं।

बिहार में कोरोना से पसरे संकट के दौर में भी मंगल पांडेय गलत जानकारी देने की वजह से खबरों में थे. विभाग से उनका जिस तरह का तालमेल था, उसे देखते हुए तो नीतीश कुमार को उनसे या तो उनका इस्तीफा लेना चाहिए था या फिर बर्खास्त करना चाहिए था। लेकिन अंधेर नगरी और चौपट राजा वाली कहानी यहां फिट बैठती है।

कोरोना संकट से जूझते बिहार में इस तबादले के बाद सरकार और राजा यानी नीतीश कुमार दोने कठघरे में हैं. उदय सिंह कुमावत विवादित अधिकारी रहे हैं और एक अंग्रेजी वेबसाइट की खबर को सच मानें तो उदय सिंह कुमावत पेरिस में हनी ट्रैप में पकड़े गए थे ।

अंग्रेजी वेबसाइट पीगुरूज ने तकरीबन दो साल पहले ही उदय सिंह कुमावत के बारे में सनसनीखेज खबर छापी थी। वेबसाइट के मुताबिक उदय सिंह कुमावत पेरिस में फ्रांस के खुफिया विभाग के हनीट्रैप में पकडे गए थे। फ्रांस की एजंसी ने इससे संबंधित सीडी भारतीय एजंसी रॉ को सौंपी थी।


संजय कुमार के तबादले की वजह सियासी ज्यादा है, प्रशासनिक कम। हालांकि कायदे से अभी उनका तबादला किया जाना सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि संजय कुमार पिछले कई महीने से कोरोना संकट के कामकाज को देख रहे थे।

अब नए अधिकारी आएंगे तो नए सिरे से कामकाज को देखेंगे और इससे काम करने वालों की परेशानी बढ़ेगी. लेकिन नीतीश कुमार की अंतरात्मा जागी क्योंकि संजय कुमार अपने तरीके से काम कर रहे थे।

कुछ ऐसे फैसले लिए जिससे नीतीश कुमार तिलमिलाए और फिर क्या था अंतरात्मा जाग गई। मजदूरों, शिक्षकों, किसनों और छात्रों की बेबसी और परेशानी के बावजूद उनकी अंतरात्मा सोई ही रही थी। लेकिन संजय कुमार के काम करने के तरीके ने नीतीश कुमार की सोई अंतरात्मा को जगाई क्योंकि संजय कुमार ने कुछ असहज करने वाले फैसले लिए थे।

फिर किसी निरंकुश राजा की तरह उन्होंने संजय कुमार के तबादले का फरमान जारी कर डाला। संजय कुमार 1990 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और पिछले साल ही झारखंड से वापस बिहार आए थे।

बिहार आने के बाद उन्हें स्वास्थ्य विभाग का जिम्मा दिया गया था और कोरोना महामारी के बीच सोशल मीडिया के जरिए वे लगातार आंकड़े साझा कर रहे थे। लेकिन अचानक ही सरकार ने स्वास्थ्य विभाग से उन्हें हटा कर पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी सौंप दी।


आम दिनों में यह सामान्य बात थी। लेकिन कोरोना संकट के बीच स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव के तबादले को सामान्य या रूटीन तबादला तो नहीं ही कहा जा सकता। मंगल पांडेय से तो टकराव उनका था ही। लेकिन कई ऐसी बातें और थीं जो नीतीश कुमार को बेतरह चुभीं।

ऐसा कहा जा रहा है कि संजय कुमार के कई फैसलों की वजह से नीतीश कुमार असहज थे. इससे उनकी नाराजगी बढ़ी और फिर तबादले की यह वजह बनी. सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा है कि करीब महीने-दो महीने पहले स्वास्थ्य विभाग ने पीएमसीएच के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. सत्येंद्र नारायण सिंह को निलंबित कर दिया था।

कोरोना नमूनों की जांच में उन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगे थे। वैसे सियासत को नजदीक से जानने वाले यह भी जानते हैं कि सत्येंद्र नारायण सिंह का रसूख बिहार में सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। कहा जाता है कि नीतीश कुमार से उनकी कई वजहों से याराना है। यह बात सच भी साबित हुई।

उन्हें गंभीर आरोपों में आठ अप्रील को निलंबित किया गया लेकिन पांच दिन बाद ही उनका निलंबन वापस ले लिया गया और डा. सत्येंद्र नारायण सिंह को फिर से पुराने पद पर बहाल भी कर दिया गया।

ऐसा कहा जा रहा है कि सिंह का निलंबन वापस लेने और उन्हें पुराने पद पर ही बहाल करने का फरमान सीधे उपर से आया था। यह ऊपर कौन है, समझा जा सकता है. हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने इस पर आपत्ति भी जताई थी लेकिन आपत्ति नक्कारखाने की आवाज बन कर रह गई और फरमान नहीं बदला गया।

इससे बिहार सरकार की फजीहत भी हुई थी और विपक्ष ने आरोप लगाया था कि एक खास वर्ग से आने की वजह से ही सिंह का निलंबन वापस ले लिया गया।

फिर कोरोना संकट के बीच स्वास्थ्य विभाग ने कई डॉक्टरों की गंभीर लापरवाही पकड़ी थी. उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जा रही थी। कार्रवाई की जद में कुछ खास जिलों के कई डॉक्टर आए थे। ऐसा कहा जाता है कि सरकार उन डॉक्टरों पर कार्रवाई के खिलाफ थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने उसे नहीं समझा। डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई हुई तो सरकार की बेचैनी बढ़ी। बिहार में यह बात भी आमतौर पर आम है कि सरकार मंत्री नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं।

नीतीश कुमार के कुछ खास और चहेते अधिकारी हैं जो सरकार को चला रहे हैं और स्याह को सफेद बनाने के खेल में लगे हुए हैं। सियासी गलियारे में तो इस बात की भी चर्चा है कि नौकरशाहों के इस गिरोह के सामने पूरी राजसत्ता दरबारी की तरह रहती है।

बिहार में ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर ठेका-पट्टे के सारे बड़े काम को यह गिरोह ही अंजाम दिया करता था लेकिन संजय कुमार की वजह से स्वास्थ्य विभाग में इनकी दाल नहीं गल रही थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि विभाग पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए भी संजय कुमार को वहां से हटवाया गया है।

बिहार के स्वास्थ्य विभाग में मंत्री और प्रधान सचिव के बीच टकराव की खबरें आम थी। यहां तक की सोशल मीडिया पर भी दोनों के बीच तालमेल न के बराबर दिख जा रही थी। कोरोना को लेकर मंत्री और प्रधान सचिव के ट्वीट में अक्सर फर्क होता था। स्वास्थ्य विभाग में चर्चा आम थी कि स्वास्थ्य मंत्री और प्रधान सचिव के बीच छत्तीस का आंकड़ा है इसलिए भाजपा भी नीतीश कुमार पर संजय कुमार को हटाने का दबाव डाल रही थी।

वैसे कहा तो यह भी जाता है कि नीतीश कुमार के दौर में मंत्रियों की नाराजगी से अधिकारियों की सेहत पर बहुत फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन मंगल पांडेय उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नजदीकी हैं इसलिए दबाव काम कर गया. नीतीश कुमार पहले से ही नाराज थे। भाजपा का दबाव रंग लाया और स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव हटा डाले गए।

विभाग के नए मुखिया अपना कार्यभार संभाल कर जब तक चीजों को समझेंगे तब तक कोरोना और पैर पसार चुका होगा। लेकिन नीतीश कुमार को इससे क्या फर्क पड़ता है। सरकार उनकी है, वे सरकार में हैं और कोरोना काल में भी वे मस्त हैं, अवाम और मजदूर जरूर पस्त हैं।

लेकिन इससे नीतीश कुमार को न तो फर्क पड़ता है और न ही अंतरात्मा जागती है.