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एनआरसी के विरोध आंदोलन के बीच भी सीमांचल में नहीं हो रही विपक्षी दलों की एकजुटता

सीमांचल में नहीं है विपक्षी दलों की एकजुटता
फोटो – सीमांचल में नहीं है विपक्षी दलों की एकजुटता

एनडीए गठबंधन की सरकार की धूर विरोधी बनी सीमांचल में किस राजनीतिक दल या गठबंधन का बर्चस्व स्थापित होगा , अभी तक इसके कोई अंदाजा नहीं लगाये जा सके हैं ।

सीमांचल से अशोक/विशाल की रिपोर्ट ।

  • विपक्ष से उभर कर सामने नहीं आ सके हैं न कोई नेता , न कोई पार्टी
  • 18 को तेजस्वी की और 20 को कन्हैया की होगी बायसी में धमक
  • लेकिन कन्हैया पर हो रहे हमलों पर विपक्षी दलों की जारी रही चुप्पी से सीमांचल भौचक
  • एक दूसरे को नीचा दिखाने और एकदूसरे की टांग खींचने से बाज़ नहीं आ रहे हैं कोई विपक्षी दल
  • नीतीश कुमार को भी विपक्ष की आपसी सिरफुटौव्वल देख महसूस नहीं हो रहे हैं भावी चुनावी खतरे
  • जबकि फ़िल्बक्त एमआइएम की कोरामिन से सीमांचल की भावी राजनीति हो रही है ऊर्जावान

एनडीए गठबंधन की सरकार की धूर विरोधी बनी सीमांचल में किस राजनीतिक दल या गठबंधन का बर्चस्व स्थापित होगा , अभी तक इसके कोई अंदाजा नहीं लगाये जा सके हैं ।

एनआरसी विरोधी जनांदोलन की इस सीमांचल में जो आग धधकी हुई है , उसकी अगुआई हासिल करने के लिए विपक्ष के सारे राजनीतिक दलों ने एड़ी चोटी के जोर लगा रखें हैं। लेकिन , यह खुलासा नहीं हो पा रहा है कि सीमांचल की राजनीति का मार्गदर्शक कौन सा नेता होगा या कौन सी पार्टी होगी।

नेता के रूप में वर्चस्व जमाने के लिए एक ओर कांग्रेस के किशनगंज सांसद डॉ जावेद आज़ाद पूरे सीमांचल के चप्पे चप्पे में आंदोलित जनता की गणेश परिक्रमा करते फ़िर रहे हैं तो दूसरी ओर एमआइएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान (पूर्व विधायक) चप्पे चप्पे के आंदोलनकारियों को ऊर्जावान बनाते फ़िर रहें हैं ।

इस बीच विपक्ष के सारे दल   ” मुख में राम-बगल में छुरी ” वाली कहाबत को चरितार्थ करते हुए एक दूसरे विपक्षी नेता  की टांगें खींचकर खुद को ही आंदोलित जनता का नेतृत्वकर्ता सावित करने पर  आमादा हैं , जिस कारण विपक्षी दलों की एकता ही इस सीमांचल में स्थापित नहीं हो पा रही है।

वामपंथी छात्र नेता कन्हैया आते हैं तो राजद कांग्रेस छिटक जाते हैं और एमआइएम नेता ओवैसी आते हैं तो बिहार की सारी विपक्षी पार्टियां साइड पकड़ लेती हैं।

कांग्रेस और राजद की आपसी गठबंधन के बाबजूद दोनों दलों के नेताओं के बीच एकदूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है तो दूसरी ओर जाप नेता पप्पू यादव और हम पार्टी के नेता सह पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से भी विपक्षी दलें छिछ काटते नजर आते हैं।

हरेक दल की सीधी मंशा  है कि जनता के बीच एकतरफी लोकप्रियता उन्हें ही हासिल हो ।

लेकिन , सारे दल इस बात को भूल रहे हैं कि फ़िल्बक्त आमसभाओं , प्रदर्शनों में जनता की जो भी अप्रत्याशित भीड़ उनके समक्ष जुट रही हैं वे न तो उनके दलों के आह्वान पर और न किसी नेता के आह्वान पर।

भीड़ सरकार के विरोध में स्वतःस्फूर्त जुट रही हैं और उस भीड़ को संबोधित करने का अवसर प्राप्त करने वाले नेताओं व विपक्षी पार्टियों को भ्रम हो रहा है कि ये भीड़ उनकी बढ़ती लोकप्रियता के प्रमाण हैं।

जिस कारण सारे विपक्षी पार्टियों में एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मचती दिखाई दे रही है ।

सीमांचल अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है , जहां सेक्युलर नेताओं का प्रारंभ से ही स्वागत होता रहा है लेकिन यहां अब सवाल यह  खड़ा हो रहा है कि इसी सीमांचल के क्षेत्रों में एनआरसी विरोधी सभाओं को सम्बोधित करने पिछले दिनों आये वामपंथी छात्र नेता कन्हैया पर कुछ विरोधियों के द्वारा किये गए लगातार हमलों का विरोध सीमांचल में बिचरण करने वाली विपक्षी पार्टियों ने अबतक क्यों नहीं किया ।

तुर्रा यह कि एक अखबारी बयानबाजी तक से इस मामले में विपक्षी दलों के द्वारा किये गए परहेज जगजाहिर हुए।

तो यह कहना विल्कुल अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सीमांचल में  विपक्षी दलों की एकजुटता ग्रहण के साये में हैं और इस कारण यह गारन्टी नहीं दी जा सकती है कि इस सीमांचल में झारखंड और दिल्ली जैसी विधानसभा चुनाव के रिज़ल्ट  आसानीपूर्वक हांसिल हो जाएंगे ।                    

इस बीच ताज़े रिपोर्ट हैं कि बायसी विधानसभा क्षेत्र में 18 फरवरी को राजद नेता तेजस्वी यादव की जोरदार धमक होगी।

बिहार सहित सीमांचल में भी राजद की नई संगठनात्मक व्यवस्था लागू करने के बाद तेजस्वी यादव की पहली सभा सीमांचल में बायसी से शुरू होने जा रही है।

राजद के नवमनोनित पूर्णिया और किशनगंज जिले के अध्यक्ष अपने नेता के इस प्रथम आगमन पर किस तरह की भीड़ जुटा पाते हैं ,यह आने वाले तेजस्वी यादव के प्रोग्राम में बायसी की धरती पर 18 फरबरी को देखा जाएगा।

क्योंकि इसके तुरंत बाद 20 फरवरी को ही उसी बायसी की सरजमीं पर चर्चित वामपंथी छात्र नेता कन्हैया की हुंकार होंने वाली है । चर्चा है कि बायसी में कन्हैया की सभा को रिकॉर्ड तोड़ बनाने की जोरदार तैयारी इसलिए प्रारंभ की गई है कि बायसी एक ओर पूर्णिया जिले का हिस्सा है तो दूसरी ओर किशनगंज संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है।

 बहरहाल, एनडीए गठबंधन की बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को  सीमांचल से किसी तरह की सम्भावित चुनावी गड़बड़ी की आहट विल्कुल ही महसूस नहीं हो पा रही है।

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यक बहुल इस सीमांचल में जारी एनआरसी विरोधी आंदोलन के बीच ही सरकार के मंत्रीगण और स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी एनआरसी को लेकर आंदोलित सीमांचल  की  पूरी वेफ़िक्री से सैर कर जाते हैं और सीमांचल की आंदोलित जनता के बीच के लोकल रहनुमाओं के द्वारा उनके आवभगत भी किये जाते हैं ।

नीतीश कुमार जानते हैं कि आपसी सिरफुटौव्वल में लगीं विपक्षी दलों को एकजुट ताकत ही नहीं है कि उनकी पार्टी जदयू का कोई बालबांका तक कर सके।

नीतीश कुमार की ऐसी सोंच इसलिए भी सकारात्मक कही जा सकती है क्योंकि ,

अभी अभी राजद ने हरेक जिले के अपने पुराने नेतृत्वकर्ता को प्रदेश की कमिटियों में सेंट्रलाइज्ड कर लिया है तो राजद के जिलेवार पुराने नेताओं का मुंह लटक गया है ।

जाहिर सी बात है कि वैसे नेताओं के संभावित भीतरघात का खतरा राजद को बढ़ गया है।

दूसरी ओर ,  राजद की ही तर्ज़ पर कांग्रेस भी अपनी पार्टी के अंदर ऐसी ही व्यवस्था करने की तैयारी में लगी है तो कांग्रेस के पुराने घाघ  नेताओं के भी बिफरने का खतरा कांग्रेस के अंदर बढ़ता नजर आ रहा है ।

अन्य बचे खुचे दलों को भी अपनी कोई चिंता है नहीं और सबमिलकर राजद और कांग्रेस की हवा निकालने में ही भिड़े हुए हैं। तो ऐसी स्थिति में एमआइएम की कोरामिन से राजनीति की नई दिशा की ओर बढ़ रहे सीमांचल क्षेत्र का अगला मार्गदर्शक कौन होगा ,यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है ।

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