नागरिकता कानून के विरोध में स्वतः उत्पन्न आंदोलन आक्रोशित नागरिक को गैर एनडीए राजनीतिक दलों की स्वार्थपूर्ण नीती का हो रहा है समझ

सीएए , एनसीआर और एनपीआर पर देश भर में मचे राजनीतिक बबाल के बीच मुस्लिम जनाक्रोश जो देश भर की सड़कों पर उतर आया है उसे अपने अपने पक्ष में आकर्षित करने के लिए सरकार विरोधी तमाम राजनीतिक दलों की भारी जोर आज़माईश जारी हो गई हैं लेकिन , यह तय नहीं हो पा रहा है कि विरोधी दलों में से किस दल की ओर इस आक्रोशित सैलाब का झुकाव होगा।
नागरिकता कानून के विरोध में स्वतः उत्पन्न आक्रोशित जनता को गैर एनडीए राजनीतिक दलों की स्वार्थपूर्ण सक्रियता का है एहसास

सीमांचल(अशोक/विशाल)

  • नागरिकता कानून के विरोधी किसी दल विशेष के प्रति अपने आकर्षण का नहीं कर रही है इज़हार
  • अबतक नागरिकता कानून के मुद्दे पर सीमांचल के किसी जगह पर महागठबंधन के बैनर तले नहीं हो पायी है गोलबंद
  • उल्टे एकदूसरे के बर्चस्व में लगे हैं महागठबंधन
  • महागठबंधन की पार्टीया कर रही है नागरिकता कानून के आंदोलन को कमज़ोर
  • 2020 विधानसभा चुनाव के आलोक में की जा रही है राजनीति महागठबंधन के द्वारा 
  • आंदोलित जनता को है इस बात की जानकारी होती जा रही है की महागठबंधन का अंदरूनी मन क्या है

सरकार विरोधी जितने भी राजनैतिक दल जनता के विरोध को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में लगे हैं वे प्रायः ” बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने ” के इंतज़ार में ही हैं।

लिहाजा हर दल इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए इस मुहिम में शामिल होने वाले दूसरे दलों को लंघी लगाने पर तूला है।

इस क्रम में बिहार में सर्वाधिक गाली गलौज और उठापटक की स्थिति है , जहां महागठबंधन की आपसी एकता भी छिन्नभिन्न होती नजर आ रही है।

बिहार में कांग्रेस के द्वारा आयोजित किए जाने वाले नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों व सभाओं से राजद को परहेज करते देखा जा रहा है तो राजद की सीएए विरोधी सभाओं व प्रदर्शनों से कांग्रेस को परहेज करते देखा जा रहा है।

तुर्रा यह कि वामपंथी दलों के द्वारा भी एनआरसी-सीएए-एनपीआर के विरोध में आयोजित किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों व सभाओं से कांग्रेस राजद के परहेज सीमांचल में पहले ही उजागर हो चुके हैं।

एक स्वनामधन्य पार्टी जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) है और दूसरी एक पार्टी उपेंद्र कुशवाहा की है जो नागरिकता कानून के विरोध में आंदोलित है।

वहीं इनसे ऊपर की क़्वालिटी वाली एक पार्टी पूर्व सांसद पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी भी है जो चप्पे चप्पे में नागरिकता कानून के विरोध में उतरी जनता के नेतृत्व को हासिल करने के लिए उतावली होकर प्रदर्शनों व सभाओं की झड़ी लगाने में लगी है।

लेकिन ,  आंदोलित जनता किसकी मुरीद बनेगी , इस बात का नाममात्र का भी संकेत किसी ओर से नहीं मिल पा रहा है।

हैदराबादी सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम सीमांचलवासियों के बीच इस क्रम में सबसे ज्यादा सक्रिय है और संयोग से इस पार्टी से सीमांचल में एक विधायक भी स्थापित हैं लेकिन , यह पार्टी भी जनता में कितनी लोकप्रियता हासिल कर रही है , इसकी कोई परख नहीं हो पा रही है।

नागरिकता कानून के विरोध की सबसे बड़ी आग इस सीमांचल में  धधक रही है और महागठबंधन के बैनर तले सीमांचल के किसी भी जगह पर एक भी ऐसी कोई सभा अभी तक आयोजित नहीं की जा सकी है जिसमें महागठबंधन के बैनर तले शामिल अब तक के सभी दलों के नेताओं के द्वारा एक साथ हुंकार भरी गई हो।

फिलबक्त तक हरेक दलों की इस मुद्दे पर अलग अलग डफ़ली और अलग अलग राग  सुनने को मिल रही है और उसके साथ साथ एक दूसरे दल को गरियाने वाली गूंज सुनाई दे रही है ।

सीमांचल में अभी तक कांग्रेस के किसी दिग्गज नेता का इस बाबत शंखनाद नहीं हो पाया है।

राजद के नेता के रूप में आगामी 16 जनवरी को तेजस्वी यादव के द्वारा सीमांचल के किशनगंज की धरती से बिहार की पहली शंखनाद होने वाली है ।

जबकि किशनगंज से ही एआईएमआईएम के सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी की शंखनाद हो चुंकी है।

जाप के सुप्रीमो पप्पू यादव के शंखनाद की तो सीमांचल में झड़ी ही लगी हुई है।

तो  वामपंथी दल के उभरते युवा नेता कन्हैया की भी सिंहगर्जना सीमांचल में हो चुके हैं। लेकिन , जीतनराम मांझी की तो प्रचारित सभा भी नहीं हो सकी है। इसके बाबजूद भी ,

ज़ाहिर सी बात है कि नागरिकता कानून के विरोध में सड़क पर स्वतः स्फूर्त उतरी आक्रोशित भीड़ को अपने अपने पक्ष में घसीट लाने की क़वायद में सारी एनडीए विरोधी पार्टियां भिड़ीं हुईं हैं और इसी वर्ष होने वाले बिहार विधानसभा के आम चुनाव में इस जनाक्रोश को भुनाने की फिराक में सक्रिय भूमिका निभा रही है ।

लेकिन , इस कटू सच्चाई को यहां पर झुठलाया नहीं जा सकता है कि नागरिकता कानून के विरोध में स्वतः स्फूर्त आक्रोशित जनता को राजनैतिक दलों की इस स्वार्थ पूर्ण नीति का भी एहसास हो रहा है और शायद यही वजह है कि जनता किसी ख़ास दल के प्रति अपनी आकर्षण का एहसास किसी राजनैतिक दल को कराने से कतरा रही है।