राजनीती राष्ट्रिय सम्पादकीय

चुनावी बांड पर चुनाव आयोग के विरोध को झूठ पर झूठ बोलकर दबाया गया

चुनाव आयोग की आपत्तियों पर झूठ, संसद में झूठ और विपक्षी पार्टियों से बिना मसौदे के सुझाव जैसे अनगिनत झूठ की नींव पर इलेक्टोरल बॉन्ड को लागू करने की कहानी.

पहले हिस्से में आपने पढ़ा कि किस तरह से मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए गुमनाम तरीके से राजनीतिक दलों की तिजोरी भरने के लिए आरबीआई की आपत्तियों को बार-बार नजरअंदाज किया. इस हिस्से में मोदी सरकार के उस कारनामे का खुलासा है जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ खड़ी एक और संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के कड़े विरोध को पूरी तरह से ख़ारिज किया गया. इसके लिए सरकार ने संसद में झूठ बोला और जब सरकार के बयान पर सवाल उठने लगे तो उसने इस पर पर्दा डालने के लिए झूठ दर झूठ बोले. हमारी पिछली स्टोरी में आपने पढ़ा कि साल 2017 के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा जारी किए गए एक विवादास्पद बेयरर इंस्ट्रूमेंट के जरिए कारपोरेशन, ट्रस्ट अथवा एनजीओ के जरिए भारत के राजनीतिक दलों को गोपनीय रहते हुए असीमित चंदा देने का दरवाजा खोल दिया गया.

“एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि इस बॉन्ड की पहली किस्त जारी होने के बाद इसका 95 प्रतिशत हिस्सा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिला.”

इलेक्टोरल बॉन्ड की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल लंबित है. सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता का अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत), जिन्होंने ये सारी जानकारी सूचना के अधिकार कानून के तहत प्राप्त किया, कहते हैं- इस मामले पर सरकार की कथनी और करनी पर भरोसा नहीं किया जा सकता चाहे वो भरोसा भारत की संसद में ही क्यों न दिया गया हो. हमको मिले दस्तावेजों में शामिल एक गोपनीय नोट से यह बात साबित होती है कि वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने जानबूझकर कर चुनाव आयोग के अधिकारियों को इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में गुमराह किया जो अंतत: असफल सिद्ध हुआ और चुनाव आयोग ने इसका विरोध किया. इस मामले में चुनाव आयोग इकलौता नहीं था जिसके सुझावों को एक झटके में खारिज कर दिया गया. हमारे पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि सरकार ने इस मसले पर विपक्षी दलों से भी सलाह मशविरे का सिर्फ ढोंग किया. एक तरफ वो इसका दिखावा कर रही थी दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय उनका सुझाव सुने बिना, उनके सवालों का जवाब दिए बिना इस योजना को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ता रहा. 2018 के संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा सदस्य मोहम्मद नदीमुल हक़ ने सरकार से एक सीधा सा सवाल पूछा: क्या भारतीय चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड के प्रति किसी तरह का विरोध दर्ज किया है? तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री पी राधाकृष्णन ने जवाब दिया- “सरकार को इलेक्टोरल बियरर बॉन्ड के मुद्दे पर चुनाव आयोग की तरफ से किसी भी तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.” यह बयान सरासर गलत था जो जल्द ही सरकार के बीच हुए आतंरिक पत्राचार से साबित हो गया. कमोडोर बत्रा ने भी इसका खुलासा कर दिया था. हक़ ने संसद में झूठ बोलने के खिलाफ वित्त राज्यमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला दर्ज करवाया. यह ख़बर मीडिया में भी छायी रही.

अब हम ये बात साबित कर सकते हैं कि सरकार ने किस तरह से राधाकृष्णन की गलतबयानी पर लीपापोती की. यहां तक कि विशेषाधिकार हनन की शिकायत पर भी सरकार की प्रतिक्रिया में झूठ-फरेब का सहारा लिया गया. इन तमाम पत्राचारों में सिर्फ एक सवाल उठता है कि सरकार को चुनाव आयोग के इलेक्टोरल बॉन्ड पर विरोध को दबाने की इतनी बेचैनी क्यों थी? चुनाव आयोग के विरोध पर लीपापोती मई 2017 में भारतीय चुनाव आयोग ने केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय को लिखित चेतावनी दी कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक दलों को विदेशी स्रोतों से संभावित अवैध चंदे को छिपाने में मदद मिलेगी. संदिग्ध चंदादाता फर्जी (शेल) कंपनियां स्थापित करके राजनेताओं के पास काला धन पहुंचा देंगे और पैसे का सही स्रोत कभी सामने नहीं आएगा. आयोग चाहता था कि सरकार द्वारा जारी किये गए इलेक्टोरल बॉन्ड और अन्य कानूनी बदलाव, जिनसे राजनीतिक दलों के चुनावी चंदे में पारदर्शिता कम हुई है, को वापस लिया जाए.